भारतीय क्रिकेट में एक अजीब परंपरा बन गई है। जब टीम हारती है तो सबसे पहले निशाने पर खिलाड़ी आते हैं। उनके स्ट्राइक रेट, औसत, उम्र और भविष्य पर बहस शुरू हो जाती है। पिछले कई महीनों से रोहित शर्मा और विराट कोहली इसी दौर से गुजर रहे थे। दोनों पर सवाल उठे, उन्हें टीम से बाहर करने की मांग हुई और यहां तक कहा गया कि अब उनका समय खत्म हो चुका है। लेकिन जैसे ही दोनों ने बल्ले से जवाब दिया, पूरा विमर्श बदल गया।
अब सवाल यह है कि क्या केवल खिलाड़ियों की ही जवाबदेही तय होगी? क्या टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर से कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा?
गौतम गंभीर ने जब टीम की कमान संभाली थी, तब उम्मीद थी कि भारतीय क्रिकेट को एक स्पष्ट दिशा मिलेगी। बार-बार कहा गया कि नई टीम तैयार की जा रही है, युवा खिलाड़ियों को मौके दिए जा रहे हैं और 2027 विश्व कप को ध्यान में रखकर प्रयोग हो रहे हैं। यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन अब समय आ गया है कि इन दावों का मूल्यांकन भी किया जाए।
आख़िर इतने लंबे प्रयोगों के बाद भारतीय क्रिकेट को मिला क्या? कौन-सा ऐसा नया खिलाड़ी सामने आया है जिसने यह भरोसा दिलाया हो कि वह आने वाले वर्षों में टीम का मैच विनर बनेगा? टीम का संयोजन आज भी स्थिर नहीं दिखता। हर सीरीज में बदलाव, हर दौरे पर नए प्रयोग और हर हार के बाद नई दलील—क्या यही किसी सफल टीम की पहचान है?
कोच का काम केवल नए चेहरों को मौका देना नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी एक मजबूत टीम बनाना, खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ाना, ड्रेसिंग रूम में सकारात्मक माहौल तैयार करना और मैदान पर परिणाम देना भी होती है। अगर लगातार प्रयोगों के बाद भी टीम उसी जगह खड़ी दिखाई दे, तो सवाल सिर्फ खिलाड़ियों से नहीं बल्कि कोच से भी पूछे जाने चाहिए।
यदि रोहित शर्मा और विराट कोहली को हर खराब पारी के बाद कठघरे में खड़ा किया जा सकता है, तो गौतम गंभीर को लगातार मिले अवसरों के बाद उनके कार्यकाल का हिसाब भी देना होगा। भारतीय क्रिकेट में किसी भी पद से बड़ा देश का प्रदर्शन है। इसलिए जवाबदेही सबकी बराबर होनी चाहिए।
अब 2027 विश्व कप की चर्चा तेज हो चुकी है। कई लोग यह मान रहे हैं कि गंभीर युवा टीम के नाम पर रोहित और विराट का रास्ता रोक सकते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी खिलाड़ी का भविष्य केवल हेड कोच तय नहीं करता। अंतिम फैसला चयन समिति का होता है और चयन का सबसे बड़ा आधार प्रदर्शन होता है। यदि रोहित और विराट रन बनाते रहे, फिट रहे और टीम के लिए उपयोगी साबित होते रहे, तो उन्हें 2027 विश्व कप खेलने से कोई नहीं रोक सकता।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि जवाबदेही की संस्कृति के पक्ष में है। खिलाड़ी हो या कोच, दोनों का मूल्यांकन एक ही पैमाने पर होना चाहिए। अगर खिलाड़ी खराब प्रदर्शन पर आलोचना झेलते हैं, तो कोच भी परिणामों से बच नहीं सकता।
गौतम गंभीर एक महान खिलाड़ी रहे हैं, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन महान खिलाड़ी होना और सफल कोच होना दो अलग-अलग बातें हैं। अब उनके कार्यकाल का आकलन भावनाओं से नहीं, बल्कि नतीजों से होना चाहिए।
भारतीय क्रिकेट को बहाने नहीं, परिणाम चाहिए। और अगर परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं हैं, तो सबसे बड़ा सवाल अब खिलाड़ियों से नहीं, बल्कि टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर से पूछा जाना चाहिए। यही खेल की निष्पक्षता है और यही भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए सबसे ज़रूरी भी।