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सिंधु जल संधि पर भारत का कड़ा रुख, पाकिस्तान को साफ संदेश, समझौते पर मंडरा सकता है स्थायी संकट

सिंधु जल संधि को लेकर भारत ने साफ कर दिया है कि पुराने स्वरूप में समझौते की बहाली आसान नहीं है, पाकिस्तान की भूमिका, जल बंटवारे और आतंकवाद के मुद्दे पर अब इस समझौते का भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।
सिंधु जल संधि
भारत का जल कूटनीति वाला दांव! सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान के लिए बढ़ी मुश्किल

नई दिल्ली: सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत ने अपना रुख और सख्त कर दिया है। केंद्र सरकार के सूत्रों के अनुसार, मौजूदा स्वरूप में इस संधि को दोबारा लागू करना संभव नहीं है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करता और जल बंटवारे के मौजूदा प्रावधानों पर पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं होता, तब तक संधि को बहाल करने का सवाल नहीं उठता। ऐसे में भविष्य में इस समझौते के स्थायी रूप से समाप्त होने की संभावना भी जताई जा रही है।

भारत ने क्यों अपनाया सख्त रुख?

सरकारी सूत्रों का कहना है कि सिंधु जल संधि के मौजूदा प्रावधान भारत के हितों के अनुरूप नहीं हैं। भारत पहले ही जनसंख्या वृद्धि, स्वच्छ ऊर्जा की जरूरतों और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों का हवाला देते हुए संधि की समीक्षा की मांग कर चुका है। अब सरकार का मानना है कि मौजूदा जल बंटवारा व्यवस्था में बदलाव किए बिना संधि को जारी रखना संभव नहीं होगा।

पाकिस्तान को भारत से ज्यादा पानी, फिर भी भारी बर्बादी

सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को लगभग 135 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी मिलता है, जबकि भारत के हिस्से में केवल 33 MAF पानी आता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान अपने हिस्से के पूरे पानी का उपयोग भी नहीं कर पाता। विशेषज्ञों के अनुसार हर साल बड़ी मात्रा में पानी बिना इस्तेमाल के सीधे अरब सागर में बह जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार कई वर्षों में पाकिस्तान 35 MAF तक पानी समुद्र में बहा चुका है, जो भारत को मिलने वाले कुल हिस्से से भी अधिक है। वर्ष 2025 में भी खरीफ सीजन के दौरान 30 MAF से अधिक पानी अरब सागर में चला गया, जबकि करीब 3 MAF पानी अन्य कारणों से व्यर्थ बह गया।

भंडारण क्षमता की कमी बनी बड़ी वजह

1960 में हुई सिंधु जल संधि के बाद भी पाकिस्तान पर्याप्त जलाशय और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं कर पाया। नतीजतन बड़ी मात्रा में पानी संरक्षित होने के बजाय समुद्र में बह जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल प्रबंधन की यह कमजोरी पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

भारत के पास क्या हैं विकल्प?

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल भारत ने संधि को स्थायी रूप से समाप्त नहीं किया है, बल्कि इसे प्रभावी रूप से रोक रखा है। हालांकि यदि पाकिस्तान आतंकवाद पर कार्रवाई नहीं करता और संधि में संशोधन पर सहमत नहीं होता, तो भारत भविष्य में इससे पूरी तरह बाहर निकलने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है।

आतंकवाद और जल समझौते का जुड़ाव

भारत का स्पष्ट रुख है कि सीमा पार आतंकवाद और द्विपक्षीय सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। इसलिए जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों पर रोक नहीं लगाता, तब तक सिंधु जल संधि को पुराने स्वरूप में बहाल करने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।

क्या आगे बदल सकती है तस्वीर?

फिलहाल भारत ने संधि पर कोई समयसीमा तय नहीं की है। अब आगे की स्थिति काफी हद तक पाकिस्तान के रुख पर निर्भर करेगी। यदि इस्लामाबाद आतंकवाद पर ठोस कदम उठाने और जल बंटवारे के नए ढांचे पर बातचीत के लिए तैयार होता है, तभी भविष्य में किसी नए समझौते की संभावना बन सकती है। अन्यथा सिंधु जल संधि पर अनिश्चितता और गहराने के संकेत मिल रहे हैं।

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