India GDP Debate: भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को लेकर इन दिनों बहस तेज है। एक तरफ सरकार के जीडीपी आंकड़े तेज आर्थिक विकास की तस्वीर पेश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पूर्व आर्थिक सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इन आंकड़ों की गणना को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। गर्ग का दावा है कि पिछले साल के आंकड़ों में बदलाव, महंगाई की गणना और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के डिफ्लेटर जैसे मुद्दों की वजह से मौजूदा ग्रोथ वास्तविकता से ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है।
सरकार की ओर से इन सवालों पर सफाई दी गई है कि आंकड़ों में कोई हेरफेर नहीं हुआ है। पिछले साल की जीडीपी में बदलाव नए बेस ईयर 2022-23 के लागू होने की वजह से हुआ है। सरकार का कहना है कि नई सीरीज में अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप और ज्यादा आधुनिक डेटा स्रोतों को शामिल किया गया है।
सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी आंकड़ों पर क्या सवाल उठाए?
पूर्व आर्थिक सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी की नई गणना को लेकर मुख्य रूप से तीन सवाल उठाए हैं।
पहला सवाल बेस इफेक्ट को लेकर है। गर्ग के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही की ग्रोथ रेट को बेहतर दिखाने के लिए पिछले वित्त वर्ष 2025-26 की इसी तिमाही के अर्थव्यवस्था के आकार को करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। उनका कहना है कि अगर पिछले साल का बेस 86 लाख करोड़ रुपये ही रहता, तो मौजूदा विकास दर करीब 2.6 फीसदी होती।
दूसरा सवाल जीडीपी में इस्तेमाल होने वाले महंगाई के आंकड़े को लेकर है। गर्ग ने सवाल उठाया कि जब खुदरा महंगाई करीब 4 फीसदी और थोक महंगाई 9 फीसदी से ज्यादा रही, तो जीडीपी की गणना में डिफ्लेटर सिर्फ करीब 2.5 फीसदी कैसे रहा?
तीसरा सवाल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लेकर है। उनका कहना है कि जब कच्चे माल और तैयार उत्पाद दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, तो मैन्युफैक्चरिंग का डिफ्लेटर -1.5 फीसदी कैसे हो गया। उनके मुताबिक इसी वजह से मैन्युफैक्चरिंग की रियल ग्रोथ 7.7 फीसदी की नॉमिनल ग्रोथ के मुकाबले 9.2 फीसदी दिखाई गई।
सरकार ने 86 लाख करोड़ को 80 लाख करोड़ क्यों किया?
सरकार का कहना है कि पिछले साल के आंकड़े को 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये करना किसी तरह की आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है। इसके पीछे GDP की नई सीरीज और नया आधार वर्ष है। पुरानी GDP सीरीज में 2011-12 को बेस ईयर बनाया गया था। अब 2022-23 को नया बेस ईयर बनाया गया है। इसके साथ अर्थव्यवस्था को मापने का पूरा ढांचा नए सिरे से तैयार किया गया है।
इसे एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। अगर किसी दुकान का हिसाब-किताब कई साल पुराने सामान और कीमतों के आधार पर बनाया गया हो, तो आज की अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर सामने नहीं आएगी। पिछले 10-15 वर्षों में भारत में डिजिटल सेवाओं, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन पेमेंट, इलेक्ट्रिक व्हीकल, आधुनिक लॉजिस्टिक्स और दूसरी नई गतिविधियों का तेजी से विस्तार हुआ है। ऐसे में सरकार का तर्क है कि जब पूरी GDP सीरीज को नए आधार वर्ष और नए डेटा स्रोतों के साथ दोबारा तैयार किया गया, तो पुराने वर्षों के आंकड़ों में भी संशोधन होना स्वाभाविक है। इसलिए नई सीरीज में 2025-26 की पहली तिमाही का संशोधित आकार करीब 80 लाख करोड़ रुपये दिखता है।
यानी मौजूदा साल की ग्रोथ की तुलना नई सीरीज के पिछले साल के आंकड़े से की जानी चाहिए, न कि पुरानी सीरीज के आंकड़े से।
GDP का बेस ईयर बदलना क्यों जरूरी है?
बेस ईयर का मतलब उस वर्ष से है, जिसे अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि को मापने के लिए संदर्भ वर्ष बनाया जाता है। समय के साथ अर्थव्यवस्था का ढांचा बदलता रहता है, इसलिए पुराने बेस ईयर से लंबे समय तक GDP को मापने पर तस्वीर पूरी तरह मौजूदा अर्थव्यवस्था को नहीं दिखा सकती। मसलन, 2011-12 के मुकाबले आज डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल पेमेंट, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर एनर्जी, आधुनिक लॉजिस्टिक्स और कई नई सेवाओं का महत्व काफी बढ़ चुका है।
इसलिए बेस ईयर बदलने का मकसद अर्थव्यवस्था में आए बदलावों को आंकड़ों में बेहतर तरीके से शामिल करना होता है। हालांकि, बेस ईयर बदलने के बाद पुराने आंकड़ों की नई पद्धति से दोबारा गणना करनी पड़ती है, जिससे पुरानी GDP सीरीज के आंकड़ों में बदलाव दिखाई दे सकता है।
2022-23 के नए बेस ईयर में क्या बदला?
नई GDP सीरीज में डेटा और गणना की पद्धति को अपडेट किया गया है। इसमें अर्थव्यवस्था के अलग-अलग सेक्टरों को मापने के लिए ज्यादा आधुनिक और विस्तृत डेटा स्रोतों का इस्तेमाल किया गया है। नई व्यवस्था में GST नेटवर्क, MCA के कॉरपोरेट डेटाबेस और दूसरे प्रशासनिक डेटा स्रोतों को ज्यादा महत्व दिया गया है। इसके अलावा सेवाओं और उत्पादन की कीमतों को मापने के लिए नए इंडेक्स और ज्यादा विस्तृत डेटाबेस का इस्तेमाल किया जा रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में Double Deflation जैसी पद्धति का इस्तेमाल भी महत्वपूर्ण बदलावों में शामिल है। इसका उद्देश्य तैयार उत्पादों और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले इनपुट यानी कच्चे माल की कीमतों में बदलाव को अलग-अलग मापना है।
फैक्ट्रियों में कीमतें बढ़ीं तो डिफ्लेटर -1.5% कैसे?
यही इस पूरे विवाद का सबसे तकनीकी हिस्सा है।
Double Deflation में सिर्फ तैयार माल की कीमत को नहीं देखा जाता, बल्कि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में बदलाव को भी अलग से मापा जाता है। मान लीजिए किसी फैक्ट्री के तैयार उत्पाद की कीमत 10 फीसदी बढ़ती है, लेकिन उसी उत्पाद को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमत 14 फीसदी बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में इनपुट और आउटपुट की कीमतों में अंतर के आधार पर वास्तविक वैल्यू एडेड की गणना बदल सकती है। इसी वजह से नॉमिनल ग्रोथ और रियल ग्रोथ के बीच अंतर दिखाई दे सकता है। इसलिए अगर मैन्युफैक्चरिंग की नॉमिनल ग्रोथ 7.7 फीसदी है और रियल ग्रोथ 9.2 फीसदी निकलती है, तो दोनों के बीच -1.5 फीसदी का डिफ्लेटर दिखाई दे सकता है। इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि फैक्ट्रियों में सामान सस्ता हो गया। यह कीमतों और वास्तविक उत्पादन की गणना से जुड़ा सांख्यिकीय प्रभाव है।
महंगाई ज्यादा थी तो GDP डिफ्लेटर सिर्फ 2.5% क्यों?
GDP डिफ्लेटर को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यह CPI या WPI जैसा नहीं होता।
CPI यानी खुदरा महंगाई आम उपभोक्ता की खरीदारी से जुड़ी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को मापता है। वहीं WPI मुख्य रूप से थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाता है। GDP डिफ्लेटर इससे व्यापक होता है। इसमें देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव को अर्थव्यवस्था के व्यापक स्तर पर देखा जाता है।
इसलिए यह जरूरी नहीं कि CPI या WPI में महंगाई ज्यादा होने पर GDP डिफ्लेटर भी उसी अनुपात में बढ़े। अलग-अलग सेक्टरों की कीमतों और उनके GDP में योगदान के आधार पर अंतिम डिफ्लेटर अलग हो सकता है।
माइनिंग सेक्टर के आंकड़ों में इतना अंतर क्यों?
खनन क्षेत्र के आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठे हैं। यहां वॉल्यूम और कीमत के अंतर को समझना जरूरी है। मान लीजिए किसी किसान ने पिछले साल 10 बोरी गेहूं बेचा और इस साल सिर्फ 8 बोरी बेचा। लेकिन इस साल गेहूं की कीमत काफी बढ़ गई। ऐसे में मात्रा कम होने के बावजूद उसकी कुल बिक्री की रकम ज्यादा हो सकती है। इसी तरह खनन क्षेत्र में वास्तविक उत्पादन की मात्रा में गिरावट के बावजूद अगर खनिजों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी होती है, तो सेक्टर का नॉमिनल मूल्य काफी तेजी से बढ़ सकता है।
यानी किसी सेक्टर की वास्तविक मात्रा (Volume) और उसकी बाजार कीमत (Value) में अंतर हो सकता है। GDP की गणना में दोनों को अलग-अलग तरीके से देखा जाता है।
GDP के आंकड़ों में अंतर कब खत्म होगा?
GDP के आंकड़े एक ही स्रोत से नहीं आते। अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को मापने के लिए उत्पादन और खर्च जैसे अलग-अलग तरीकों से डेटा जुटाया जाता है। शुरुआती तिमाही के आंकड़े उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर तैयार होते हैं, इसलिए बाद में इनमें संशोधन की गुंजाइश रहती है। जैसे-जैसे कंपनियों, सरकारी विभागों और अलग-अलग सेक्टरों से ज्यादा पुख्ता आंकड़े उपलब्ध होते हैं, GDP के अनुमान को अपडेट किया जाता है। इसी प्रक्रिया में शुरुआती आंकड़ों और बाद के आंकड़ों के बीच मौजूद सांख्यिकीय अंतर कम हो सकता है।
तो क्या GDP के आंकड़े गलत हैं?
इस पूरे विवाद का सीधा जवाब फिलहाल ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना मुश्किल है। सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP की नई गणना में इस्तेमाल हो रही पद्धति और आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि बदलाव नई GDP सीरीज और बेहतर डेटा प्रणाली की वजह से हुए हैं। बेस ईयर बदलने के बाद पुराने आंकड़ों का संशोधन अपने आप में असामान्य नहीं है। असली सवाल यह है कि नई पद्धति कितनी पारदर्शी है, इस्तेमाल किए गए डेटा कितने विश्वसनीय हैं और अलग-अलग सेक्टरों के आंकड़े वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को कितनी सटीकता से दर्शाते हैं।
यही वजह है कि GDP पर चल रही बहस को सिर्फ ‘तेज ग्रोथ बनाम आंकड़ों का खेल’ के रूप में देखने के बजाय GDP की नई गणना पद्धति, बेस ईयर, डिफ्लेटर और डेटा स्रोतों के संदर्भ में समझना ज्यादा जरूरी है।