UNSC में भारत को क्यों मिलनी चाहिए परमानेंट सीट? आंकड़ों से समझिए दावेदारी

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार की मांग भारत लंबे समय से करता रहा है। 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता।
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UNSC में भारत को क्यों मिलनी चाहिए परमानेंट सीट?

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार की मांग भारत लंबे समय से करता रहा है। 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता। उन्होंने वैश्विक संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की बड़ी भूमिका की जरूरत बताई। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी BRICS सम्मेलन में कहा कि आज की दुनिया 1945 की दुनिया से काफी अलग है और वैश्विक संस्थाओं को मौजूदा वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने की जरूरत है।

ऐसे में सवाल उठता है कि UNSC में भारत को स्थायी सदस्यता देने के पक्ष में कौन-कौन से तर्क दिए जाते हैं? इसे आबादी, अर्थव्यवस्था, शांति अभियानों में योगदान और वैश्विक भूमिका जैसे आंकड़ों से समझा जा सकता है।

क्या है UNSC और इसका मौजूदा ढांचा?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मामलों में संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। इसमें कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन पांच स्थायी सदस्य हैं और उनके पास वीटो पावर है। बाकी 10 सदस्य अस्थायी होते हैं, जिन्हें क्षेत्रीय आधार पर सीमित अवधि के लिए चुना जाता है। भारत का तर्क है कि परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था को ज्यादा दर्शाती है, जबकि आज दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक ताकत का संतुलन काफी बदल चुका है। BRICS की नई दिल्ली घोषणा में भी विकासशील देशों की वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक और सार्थक भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया गया है।

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में भारत

भारत की UNSC दावेदारी का सबसे बड़ा आधार उसकी आबादी को माना जाता है। भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है और दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा यहां रहता है। भारत का तर्क है कि जब वैश्विक निर्णयों का असर अरबों लोगों पर पड़ता है, तो दुनिया के सबसे बड़े जनसंख्या वाले देशों में से एक को संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था में स्थायी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

यह तर्क केवल भारत की आबादी तक सीमित नहीं है। UNSC सुधार की व्यापक मांग में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों के विकासशील देशों की बेहतर भागीदारी भी शामिल है। BRICS देशों ने भी वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की मांग दोहराई है।

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी मजबूत आधार

भारत की अर्थव्यवस्था भी उसकी दावेदारी का एक महत्वपूर्ण आधार है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत की भूमिका पिछले वर्षों में बढ़ी है और वैश्विक व्यापार, निवेश, तकनीक और विकास से जुड़े मुद्दों में भारत की आवाज का महत्व बढ़ा है। यही वजह है कि भारत UNSC के साथ-साथ IMF, विश्व बैंक और दूसरी वैश्विक संस्थाओं में भी मौजूदा प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में बदलाव की मांग करता रहा है। BRICS के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने भी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की जरूरत पर जोर दिया है।

UN Peacekeeping में भारत का लंबा योगदान

भारत की दावेदारी का एक महत्वपूर्ण आधार संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में उसका योगदान भी है। भारत ने शुरुआती दौर से ही UN Peacekeeping Missions में सैनिक और अन्य वर्दीधारी कर्मी भेजे हैं। जनवरी 2026 के संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, UN Peacekeeping में भारत के 4,268 वर्दीधारी कर्मी तैनात थे। इनमें 3,965 सैनिकों के अलावा पुलिस और अन्य श्रेणियों के कर्मी भी शामिल थे। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, भारत के 180 से अधिक शांति सैनिक UN के झंडे के तहत अपनी जान गंवा चुके हैं। UN ने भारत को लंबे समय से अपने प्रमुख peacekeeping contributors में शामिल किया है।

भारत का कहना है कि जिस देश ने दशकों तक अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों में योगदान दिया है, उसे वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले मंच में स्थायी भूमिका मिलनी चाहिए।

परमाणु शक्ति और रणनीतिक क्षमता

भारत एक परमाणु हथियार संपन्न देश भी है। SIPRI की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 में भारत के पास अनुमानित 190 परमाणु हथियार थे। इसी रिपोर्ट में चीन के पास लगभग 620 और पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान दिया गया है।

भारत की दलील यह है कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में परमाणु हथियारों, क्षेत्रीय संघर्षों और रणनीतिक स्थिरता से जुड़े मुद्दों की अहमियत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भारत जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देश की स्थायी भागीदारी सुरक्षा परिषद की संरचना को मौजूदा रणनीतिक वास्तविकताओं के करीब ला सकती है।

UNSC में भारत का पुराना अनुभव

भारत पहले भी कई बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है। इन कार्यकालों के दौरान भारत ने आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, शांति अभियानों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को उठाया है। भारत की स्थायी सदस्यता की मांग केवल उसकी वर्तमान आर्थिक या सैन्य क्षमता पर आधारित नहीं है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के साथ उसके लंबे जुड़ाव और बहुपक्षीय व्यवस्था में भूमिका पर भी आधारित है।

सिर्फ भारत की नहीं, UNSC सुधार की बड़ी मांग

भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा UNSC में व्यापक सुधार की मांग से जुड़ा हुआ है। BRICS की नई दिल्ली घोषणा में विकासशील और कम विकसित देशों की वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक सार्थक भागीदारी और प्रतिनिधित्व की जरूरत पर जोर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव गुटेरेस ने भी कहा है कि आज की बहुध्रुवीय दुनिया में वैश्विक संस्थाओं को मौजूदा आर्थिक, राजनीतिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए। इसलिए भारत की UNSC स्थायी सदस्यता की दावेदारी को केवल एक देश की मांग के तौर पर नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की पूरी संरचना में सुधार की व्यापक बहस के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, स्थायी सदस्यता के लिए केवल किसी देश की आर्थिक, सैन्य या जनसंख्या शक्ति पर्याप्त नहीं है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बदलाव और सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति की जरूरत होगी। यही वजह है कि UNSC सुधार का मुद्दा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।

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