ब्रिटेन। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का नाम सुनते ही किसी भी मरीज और उसके परिवार की चिंता बढ़ जाती है। लेकिन सोचिए, अगर कोई व्यक्ति 11 साल तक कैंसर का इलाज कराता रहे और फिर पता चले कि उसे कैंसर था ही नहीं, तो उस पर क्या गुजरेगी। ब्रिटेन की बेकी जोन्स के साथ ऐसा ही हुआ। 21 साल की उम्र में उन्हें ब्रेन कैंसर होने की बात बताई गई थी। इसके बाद उन्होंने करीब 11 साल तक कीमोथेरेपी कराई। लेकिन 2025 में विशेषज्ञों की स्वतंत्र समीक्षा के बाद सामने आया कि उन्हें कैंसर नहीं, बल्कि दिमाग में सूजन की समस्या थी।
21 साल की उम्र में बताया गया ब्रेन कैंसर
साल 2012 में बेकी को तेज माइग्रेन की समस्या होने लगी। जांच के बाद उनके दिमाग में एक घाव जैसी स्थिति दिखाई दी। इसके बाद उनकी ब्रेन बायोप्सी कराई गई। बेकी के मुताबिक, कंसल्टेंट प्रोफेसर इयान ब्राउन ने बायोप्सी के नतीजे आने से पहले ही उन्हें ग्रेड-4 ग्लियोब्लास्टोमा होने की बात बता दी थी। उन्हें बताया गया कि यह बेहद आक्रामक ब्रेन कैंसर है और उनके पास जीने के लिए बहुत कम समय बचा है।
उस समय बेकी पुलिस में करियर बनाने का सपना देख रही थीं। अचानक मिली इस बीमारी की खबर ने उनकी जिंदगी बदल दी।
11 साल तक चलती रही कीमोथेरेपी
बेकी के अनुसार, उन्हें टेमोजोलोमाइड (TMZ) नाम की कीमोथेरेपी दवा दी गई। उनका कहना है कि उन्हें बार-बार बताया गया कि अगर उन्होंने कीमोथेरेपी बंद की तो उनकी मौत हो सकती है।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सामान्य उपचार दिशानिर्देशों में इस दवा के करीब छह महीने के छह चक्रों की सिफारिश की जाती है, लेकिन बेकी का इलाज 11 साल से ज्यादा समय तक चलता रहा। इस दौरान उन्हें लगातार मतली, पेट दर्द, मुंह में छाले और थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। बीमारी के डर और इलाज के असर के कारण उनका सामाजिक और पेशेवर जीवन भी प्रभावित हुआ।
स्कैन में ट्यूमर नहीं दिखा तो भी जारी रहा इलाज
बेकी का कहना है कि इलाज के दौरान कई स्कैन में उन्हें ट्यूमर का स्पष्ट सबूत नहीं दिखाई देता था। जब उन्होंने इस बारे में सवाल किया तो उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि ट्यूमर सामान्य तौर पर दिखाई नहीं देता।
बाद में स्वतंत्र विशेषज्ञों ने उनके पुराने मेडिकल रिकॉर्ड और स्कैन की समीक्षा की। मई 2025 में उन्हें बताया गया कि उनके दिमाग में कैंसर नहीं था। विशेषज्ञों के अनुसार, उन्हें tumefactive demyelination नाम की स्थिति थी। इसमें मस्तिष्क में सूजन और घाव जैसी स्थिति बन सकती है, जो कभी-कभी ब्रेन ट्यूमर जैसी दिखाई दे सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक, इसका इलाज स्टेरॉयड जैसी दवाओं से किया जा सकता था।
40 से ज्यादा मरीज कर रहे हैं कानूनी कार्रवाई
बेकी जोन्स उन 40 से ज्यादा मरीजों में शामिल हैं, जो University Hospitals Coventry and Warwickshire (UHCW) NHS Trust के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर रहे हैं। इन मामलों में लंबे समय तक या कथित तौर पर गैर-जरूरी कैंसर उपचार दिए जाने के आरोपों की जांच हो रही है।
रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियंस की शुरुआती समीक्षा में 20 मामलों को देखा गया। बीबीसी के मुताबिक, इनमें 15 मामलों को कुल मिलाकर असंतोषजनक पाया गया और लंबे समय तक TMZ दिए जाने के पीछे पर्याप्त लाभ के प्रमाण नहीं मिलने की बात सामने आई। समीक्षा में अस्पताल की निगरानी और उपचार व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए।
‘मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई’
सच्चाई सामने आने के बाद बेकी ने कहा कि उन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा ऐसी बीमारी के इलाज में गुजार दिया, जो उन्हें थी ही नहीं। उनके मुताबिक, इलाज के दौरान उन्हें लगातार यह डर रहा कि अगर उन्होंने दवा बंद की तो उनकी मौत हो सकती है।
बेकी ने कहा कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर नहीं था और गलत डायग्नोसिस के कारण उनकी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा इलाज में गुजर गया। मामले को लेकर कानूनी प्रक्रिया जारी है और संबंधित स्वास्थ्य संस्थानों की ओर से मरीजों की देखभाल और दवा के इस्तेमाल की निगरानी मजबूत करने की बात कही गई है।