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776 रन, 72 छक्के… फिर भी डेब्यू नहीं! क्या वैभव के साथ हुआ इंसाफ?

वैभव सूर्यवंशी का डेब्यू नहीं

776 रन और 72 छक्कों के बावजूद वैभव सूर्यवंशी को डेब्यू न मिलने से टीम इंडिया की चयन नीति और असाधारण प्रतिभाओं के साथ व्यवहार पर नई बहस छिड़ गई है।

15 साल की उम्र में कोई खिलाड़ी आईपीएल में 776 रन बना दे, 72 छक्के उड़ा दे, दुनिया के बड़े गेंदबाजों के खिलाफ बेखौफ बल्लेबाजी करे और फिर भी टीम इंडिया की प्लेइंग-11 में जगह न बना पाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आयरलैंड के खिलाफ पहले टी20 में वैभव सूर्यवंशी को मौका नहीं मिला, लेकिन उनके डेब्यू से बड़ा मुद्दा अब चयन नीति पर छिड़ी बहस बन गया है।

वैभव सूर्यवंशी ने पिछले कुछ महीनों में जिस तरह का प्रदर्शन किया है, उसने उन्हें सिर्फ एक उभरता हुआ खिलाड़ी नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित युवा सितारों में शामिल कर दिया है। आईपीएल में उनकी आक्रामक बल्लेबाजी, रिकॉर्डतोड़ पारियां और अलग-अलग स्तर पर लगातार रन बनाने की क्षमता ने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। इसके बावजूद उन्हें बेंच पर बैठना पड़ा।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—क्या टीम इंडिया में सिर्फ प्रदर्शन ही काफी नहीं है, या फिर असाधारण प्रतिभाओं को भी अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है?

भारतीय क्रिकेट में अब चयन सिर्फ रन बनाने के आधार पर नहीं होता। टीम बैलेंस, मौजूदा खिलाड़ियों की फॉर्म, उनकी भूमिका, फिटनेस और ड्रेसिंग रूम की निरंतरता जैसे कई पहलू अहम माने जाते हैं। यही वजह है कि अभिषेक शर्मा और संजू सैमसन जैसे इन-फॉर्म ओपनरों के रहते वैभव के लिए प्लेइंग-11 में जगह बनाना आसान नहीं था।

बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक भी साफ कर चुके हैं कि किसी नए खिलाड़ी को मौका देने के लिए उस खिलाड़ी को बाहर नहीं किया जा सकता, जो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा हो। टीम मैनेजमेंट का यह तर्क अपनी जगह सही भी लगता है, क्योंकि प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के साथ न्याय करना भी जरूरी है।

लेकिन बहस यहीं खत्म नहीं होती।

क्रिकेट के इतिहास में कुछ खिलाड़ी ऐसे रहे हैं, जिनकी प्रतिभा सामान्य मानकों से कहीं आगे रही। ऐसे खिलाड़ियों के लिए कई बार चयनकर्ताओं ने परंपरागत सोच से अलग फैसले भी लिए हैं। सवाल यह है कि क्या वैभव सूर्यवंशी भी उसी श्रेणी में आते हैं?

15 साल की उम्र में उन्होंने सिर्फ जूनियर क्रिकेट में नहीं, बल्कि आईपीएल जैसे दुनिया के सबसे बड़े टी20 मंच पर खुद को साबित किया है। उन्होंने अलग-अलग देशों में रन बनाए हैं, दबाव झेला है और बड़े मैचों में आत्मविश्वास दिखाया है। ऐसे में यह तर्क भी सामने आता है कि अगर इतनी उपलब्धियों के बाद भी कोई खिलाड़ी अपवाद नहीं माना जाता, तो फिर अपवाद आखिर किसे कहा जाएगा?

एक और सवाल लगातार चर्चा में है। अगर टीम मैनेजमेंट पहले से जानता था कि ओपनिंग स्लॉट तय हैं और वैभव के खेलने की संभावना बेहद कम है, तो फिर उन्हें स्क्वॉड में शामिल करने का मकसद क्या था? क्या सिर्फ माहौल समझाने के लिए? क्या केवल नेट्स में अभ्यास कराने के लिए? या विदेशी दौरे का अनुभव देने के लिए?

बेशक, टीम के साथ रहना किसी भी युवा खिलाड़ी के विकास का हिस्सा होता है। लेकिन मैच का अनुभव किसी भी अभ्यास से बड़ा होता है। यही वजह है कि कई क्रिकेट प्रशंसकों को लगता है कि वैभव जैसे खिलाड़ी को मौका देने का सही समय अभी हो सकता था।

भारतीय क्रिकेट का इतिहास बताता है कि कई बार चयनकर्ताओं ने भविष्य को ध्यान में रखकर साहसिक फैसले लिए हैं। महेंद्र सिंह धोनी इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए नियमों में लचीलापन दिखाया गया और आगे चलकर वही खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में शामिल हुए। हालांकि धोनी और वैभव की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन दोनों मामलों में एक बात समान है—असाधारण प्रतिभा को पहचानने का साहस।

इसका मतलब यह नहीं कि किसी दूसरे खिलाड़ी के साथ अन्याय किया जाए। बल्कि इसका अर्थ यह है कि जब कोई खिलाड़ी सामान्य स्तर से कहीं आगे निकल जाए, तो उसके लिए अलग सोचने की गुंजाइश भी होनी चाहिए।

फिलहाल टीम मैनेजमेंट ने मौजूदा खिलाड़ियों पर भरोसा जताया है और यह फैसला पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन वैभव सूर्यवंशी को लेकर शुरू हुई बहस इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं है।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक खिलाड़ी के डेब्यू का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारतीय क्रिकेट भविष्य के सबसे बड़े सितारों के लिए कभी-कभी अलग रास्ता चुनने का साहस दिखाएगा, या फिर हर असाधारण प्रतिभा को भी बाकी खिलाड़ियों की तरह सिर्फ अपनी बारी आने का इंतजार करना होगा?

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