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उल्लास और भक्ति के साथ होगा हिंदू नववर्ष का आगमन, 19 मार्च से शुरू होंगे वासंतिक नवरात्र

धर्मनगरी वाराणसी में उल्लास और भक्ति के साथ हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का आगमन 19 मार्च से होने जा रहा है। इसी दिन से वासंतिक नवरात्र का भी शुभारंभ होगा। घर-घर कलश स्थापना के साथ मां आदिशक्ति की आराधना, व्रत और अनुष्ठानों का सिलसिला नौ दिनों तक चलेगा।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि होने के बावजूद प्रतिपदा तिथि का मान्य रहेगा। इस कारण 19 मार्च को ही नवरात्र व्रत और हिंदू नववर्ष दोनों की शुरुआत मानी जाएगी।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार, 19 मार्च को सुबह 6:41 बजे तक अमावस्या रहेगी, इसके बाद प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हो जाएगी। सूर्योदय में अमावस्या होने के बावजूद पूरे दिन प्रतिपदा का प्रभाव रहेगा।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

बीएचयू के ज्योतिषाचार्य प्रो. सुभाष पांडेय के अनुसार, 19 मार्च को प्रातः काल से दोपहर 12:25 बजे तक कलश स्थापना का विशेष शुभ मुहूर्त है। आवश्यकता होने पर रात्रि तक भी स्थापना की जा सकती है।

प्रमुख व्रत और अनुष्ठान

नवरात्र के दौरान विभिन्न तिथियों पर विशेष पूजा और व्रत किए जाएंगे। 24 मार्च को सूर्य षष्ठी व्रत रखा जाएगा, जिसका पारण 25 मार्च को होगा। इसी दिन महानिशा पूजा भी संपन्न होगी।

काशी में प्रसिद्ध अन्नपूर्णा परिक्रमा 25 मार्च की शाम 4:54 बजे से शुरू होकर 26 मार्च की दोपहर 2:32 बजे तक चलेगी।

महाअष्टमी और नवमी का महत्व

ज्योतिर्विद पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार, 26 मार्च को महाअष्टमी और 27 मार्च को महानवमी का व्रत रखा जाएगा। 27 मार्च को दोपहर तक हवन और पाठ की पूर्णाहुति करना शुभ माना गया है।

रामनवमी का उत्सव

नवरात्र के अंतिम दिन 27 मार्च को रामनवमी का पर्व भी धूमधाम से मनाया जाएगा। मंदिरों में झांकियां सजेंगी, आरती और भजन-कीर्तन होंगे तथा घरों में प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाएगा।

प्रमुख तिथियां

  • घट स्थापना : 19 मार्च (प्रातः 6:42 बजे से दोपहर 12:25 बजे तक)
  • सूर्य षष्ठी व्रत : 24 मार्च (पारण 25 मार्च)
  • महानिशा पूजा : 25 मार्च रात्रि
  • अन्नपूर्णा परिक्रमा : 25 मार्च शाम से 26 मार्च दोपहर तक
  • महाअष्टमी : 26 मार्च
  • महानवमी व्रत : 27 मार्च
  • पूर्णाहुति : 27 मार्च दोपहर तक
  • व्रत पारण : 27 मार्च दोपहर बाद से 28 मार्च प्रातः

भक्ति और श्रद्धा से परिपूर्ण यह पर्व काशी में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक उत्साह के साथ मनाया जाएगा।


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