सोनभद्र जनपद मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर आदिवासी क्षेत्र जुगैल की पहाड़ियों के बीच स्थित जिरही देवी मंदिर आस्था और परंपरा का अनोखा केंद्र है। प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह स्थान ‘मिनी कश्मीर’ के नाम से भी जाना जाता है, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
मान्यता से जुड़ी अनोखी परंपरा
मंदिर के पुजारी कप्तान खरवार के अनुसार, जिरही देवी से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा है। मान्यता है कि माता जिरही देवी कि बारात पश्चिम दिशा से जुगैल क्षेत्र से गुजर रही थी, लेकिन जब बारातियों को प्यास लगी तो बगल में ही सेहरी नदी का पानी बह रहा था। उस बारात में दो मुस्लिम समुदाय समाज के लोग भी थे , वे जब सेमरी नदी का पानी पीने लगे तब गांव के दो लोहार जाति के व्यक्ति ने बारातियों से चुना मांगने गए सुरती खाने के लिए तो बारातियों ने उन दोनों लोहार जाति के व्यक्ति से पुछा यह कौन सी नदी है उन दोनो व्यक्ति ने बताया कि इसका नाम सियरी नदी है लेकिन सुनने में आया कि सुअरी नदी है इसी कारण दोनों मुस्लिम बाराती ने आत्महत्या कर ली तब माता जिरही ने सोचा कि अब हम किस मुंह से ससुराल जाए और फिर जिरही देवी ने वहीं पर सभी बारातयो के साथ समाधी ले ली तब से क्षेत्र में यह परंपरा चली आ रही है कि यहां की बेटियों के विवाह के बाद वर पक्ष को बकरे की बलि और श्रृंगार सामग्री अर्पित करनी होती है। स्थानीय लोग इसे देवी की परंपरा और आस्था से जोड़कर देखते हैं।
दूर-दराज से पहुंचते हैं श्रद्धालु
चैत्र नवरात्रि के अवसर पर जिरही देवी मंदिर में एक महीने तक भव्य मेले का आयोजन होता है। इस दौरान उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
मेले में सजती हैं दुकानों की कतारें
मेले के दौरान स्थानीय ग्रामीण विभिन्न प्रकार की दुकानें लगाते हैं, जिससे क्षेत्र में रौनक बढ़ जाती है। यह मेला न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए जुगैल थाना पुलिस द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं, ताकि मेला शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
यह स्थान अपनी अनोखी मान्यताओं, प्राकृतिक सुंदरता और गहरी आस्था के कारण क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।









