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खामेनेई के जनाजे में हमास, हिज्बुल्लाह और हूती की मौजूदगी, ईरान ने दिया बड़ा राजनीतिक संदेश

ईरान

अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में हमास, हिज्बुल्लाह और हूती प्रतिनिधियों की मौजूदगी को पश्चिम एशिया में ईरान के क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क और उसके राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को केवल एक धार्मिक या राजकीय कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति के बीच एक महत्वपूर्ण शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, तेहरान में आयोजित इस समारोह में लाखों लोगों की मौजूदगी के साथ ईरान समर्थित कई क्षेत्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया, इससे यह संदेश देने की कोशिश दिखाई दी कि हाल के सैन्य संघर्षों और लगातार दबाव के बावजूद ईरान का क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क अभी भी सक्रिय है।

अंतिम संस्कार में दिखा ‘Axis of Resistance’ का प्रदर्शन

समारोह में Hamas, Hezbollah और Houthi movement के प्रतिनिधियों की मौजूदगी सबसे अधिक चर्चा में रही। ईरान इन समूहों सहित कई क्षेत्रीय संगठनों को वर्षों से “Axis of Resistance” (प्रतिरोध की धुरी) का हिस्सा बताता रहा है। इस नेटवर्क में इराक के कुछ सशस्त्र समूह भी शामिल माने जाते हैं।

हाल के महीनों में गाजा, लेबनान और यमन में हुए सैन्य अभियानों के बाद इन संगठनों की क्षमता को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे थे। ऐसे माहौल में इनकी सार्वजनिक मौजूदगी को ईरान ने अपने क्षेत्रीय प्रभाव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

किन-किन नेताओं ने लिया हिस्सा?

रिपोर्टों के अनुसार, हिज्बुल्लाह के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मोहम्मद फ़नीश ने किया। प्रतिनिधिमंडल में संगठन के अन्य अधिकारी और कुछ सदस्यों के परिजन भी शामिल थे।

वहीं हमास की ओर से राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद दरविश के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचा, जिसमें बासेम नईम सहित अन्य वरिष्ठ सदस्य भी मौजूद रहे।

इसके अलावा Palestinian Islamic Jihad के महासचिव ज़ियाद अल-नखाला तथा हूती आंदोलन के वरिष्ठ प्रतिनिधि जैफ़ अल्लाह अल-शामी भी अंतिम संस्कार समारोह में शामिल हुए।

ईरान का वर्षों पुराना सहयोगी नेटवर्क

ईरान लंबे समय से हमास, हिज्बुल्लाह और हूती आंदोलन को राजनीतिक, वित्तीय और अन्य प्रकार का समर्थन देता रहा है। वहीं United States सहित कई पश्चिमी देशों ने इन संगठनों में से कुछ या सभी को आतंकवादी संगठन घोषित किया है। दूसरी ओर, ईरान इन्हें क्षेत्रीय प्रतिरोध का हिस्सा बताता है।

इसी कारण यह नेटवर्क लंबे समय से पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों का अहम विषय बना हुआ है।

क्या संदेश देना चाहता था तेहरान?

विश्लेषकों के अनुसार, अंतिम संस्कार के दौरान इन संगठनों की मौजूदगी केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं थी। इसे ईरान की ओर से एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है कि उसके क्षेत्रीय सहयोगी अब भी उसके साथ खड़े हैं।

  • हमास की मौजूदगी को गाजा संघर्ष के बावजूद उसके राजनीतिक ढांचे की सक्रियता के संकेत के रूप में देखा गया।
  • हिज्बुल्लाह के प्रतिनिधित्व ने लेबनान मोर्चे पर संगठन की निरंतर उपस्थिति का संदेश दिया।
  • हूती प्रतिनिधियों की भागीदारी ने लाल सागर क्षेत्र में उनके प्रभाव और समुद्री मार्गों से जुड़े घटनाक्रमों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।

इजरायल और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर

हाल के वर्षों में Israel ने गाजा, लेबनान और यमन में ईरान समर्थित समूहों के खिलाफ कई सैन्य अभियान चलाए हैं। अमेरिका और इजरायल दोनों की ओर से यह दावा किया जाता रहा है कि इन अभियानों से इन संगठनों को भारी नुकसान पहुंचा है।

हालांकि, अंतिम संस्कार में इन प्रतिनिधिमंडलों की मौजूदगी को कई विशेषज्ञ इस संकेत के रूप में देख रहे हैं कि इन संगठनों की राजनीतिक और संगठनात्मक संरचना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, भले ही उनकी सैन्य क्षमताओं पर असर पड़ा हो।

क्षेत्रीय राजनीति के लिए क्या मायने?

पश्चिम एशिया के जानकारों का मानना है कि यह समारोह ईरान के लिए केवल अपने सर्वोच्च नेता को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं था, बल्कि अपने सहयोगी नेटवर्क की एकजुटता प्रदर्शित करने का भी मंच था।

हालांकि, किसी संगठन के प्रतिनिधियों की किसी कार्यक्रम में मौजूदगी मात्र से उसकी सैन्य क्षमता, प्रभाव या भविष्य की ताकत का निश्चित आकलन नहीं किया जा सकता। इन संगठनों की वास्तविक स्थिति, प्रभाव और क्षमताओं का मूल्यांकन कई राजनीतिक, सैन्य और क्षेत्रीय कारकों पर निर्भर करता है।

कुल मिलाकर, खामेनेई के अंतिम संस्कार ने यह जरूर दिखाया कि ईरान अपने क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क को अब भी अपनी विदेश नीति और रणनीतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है, जबकि पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन और सुरक्षा चुनौतियों को लेकर बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।

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