नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर विकसित भारत के लिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का विजन सामने रखा। इसमें मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और फूड प्रोसेसिंग, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, गति शक्ति, रक्षा, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा सॉफ्ट पावर को भारत की भविष्य की प्रगति के प्रमुख आधार के तौर पर बताया गया।
पीएम मोदी ने ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी की क्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ब्लू इकोनॉमी क्या है, इसमें कौन-कौन से क्षेत्र आते हैं और यह पारंपरिक मरीन इकोनॉमी से कैसे अलग है?
क्या होती है ब्लू इकोनॉमी?
ब्लू इकोनॉमी यानी नीली अर्थव्यवस्था का मतलब समुद्र और तटीय संसाधनों का इस तरह सतत उपयोग करना है, जिससे आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर पैदा हों, लेकिन समुद्री पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न पहुंचे।
आसान भाषा में समझें तो समुद्र से जुड़े कारोबार और संसाधनों का इस्तेमाल करके आर्थिक लाभ हासिल करना, लेकिन ऐसा करते समय समुद्री जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना ही ब्लू इकोनॉमी का मूल विचार है।
इसमें समुद्र से मिलने वाले संसाधनों का केवल दोहन नहीं, बल्कि संरक्षण और टिकाऊ विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ब्लू इकोनॉमी में कौन-कौन से क्षेत्र शामिल हैं?
ब्लू इकोनॉमी का दायरा सिर्फ मछली पकड़ने तक सीमित नहीं है। इसके तहत कई पारंपरिक और आधुनिक क्षेत्र आते हैं।
मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर
मछली पकड़ना, मछली पालन, समुद्री जीवों का संवर्धन और सी-फूड प्रोसेसिंग ब्लू इकोनॉमी के प्रमुख हिस्से हैं। इसका लक्ष्य समुद्री संसाधनों का जरूरत से ज्यादा दोहन किए बिना उत्पादन और रोजगार बढ़ाना है।
समुद्री परिवहन और बंदरगाह
दुनिया के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों के जरिए होता है। इसलिए आधुनिक बंदरगाह, बेहतर शिपिंग सिस्टम और ग्रीन पोर्ट्स ब्लू इकोनॉमी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
समुद्री पर्यटन
तटीय पर्यटन, क्रूज टूरिज्म, वाटर स्पोर्ट्स और इको-टूरिज्म भी इसके दायरे में आते हैं। इसका उद्देश्य पर्यटन बढ़ाने के साथ समुद्री और तटीय पर्यावरण को सुरक्षित रखना है।
समुद्री नवीकरणीय ऊर्जा
समुद्र से मिलने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल भी ब्लू इकोनॉमी का अहम हिस्सा है। इसमें ऑफशोर विंड एनर्जी, ज्वार-भाटा और समुद्री लहरों से ऊर्जा पैदा करने जैसी संभावनाएं शामिल हैं।
डीप-सी रिसर्च और मरीन बायोटेक्नोलॉजी
समुद्र की गहराई में मौजूद खनिजों और जैविक संसाधनों की खोज, समुद्री जीवों से दवाइयों और नई सामग्री का विकास भी इस क्षेत्र में आता है।
हालांकि, डीप-सी माइनिंग जैसे क्षेत्रों में पर्यावरणीय जोखिम को लेकर विशेष सावधानी जरूरी है। इसलिए सतत विकास और समुद्री पारिस्थितिकी की सुरक्षा इसका अहम हिस्सा है।
मरीन इकोनॉमी और ब्लू इकोनॉमी में क्या अंतर है?
दोनों शब्द समुद्र से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होते हैं, लेकिन इनके नजरिए में महत्वपूर्ण अंतर है।
मरीन इकोनॉमी का इस्तेमाल व्यापक रूप से समुद्र से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों—जैसे मछली पालन, शिपिंग, बंदरगाह, समुद्री पर्यटन और समुद्री संसाधनों—के लिए किया जा सकता है।
वहीं ब्लू इकोनॉमी में आर्थिक गतिविधियों के साथ सस्टेनेबिलिटी और समुद्री पर्यावरण का संरक्षण केंद्रीय भूमिका निभाता है।
यानी आसान भाषा में:
मरीन इकोनॉमी = समुद्र से जुड़ी आर्थिक गतिविधियां
ब्लू इकोनॉमी = समुद्र से जुड़ी आर्थिक गतिविधियां + पर्यावरण संरक्षण + सतत विकास
इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि ब्लू इकोनॉमी समुद्री अर्थव्यवस्था को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-केंद्रित नजरिए से देखने का तरीका है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ब्लू इकोनॉमी?
भारत के लिए समुद्र आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। देश की लंबी तटरेखा, समुद्री व्यापार, मत्स्य संसाधन और विशाल समुद्री क्षेत्र ब्लू इकोनॉमी के लिए बड़ी संभावनाएं पैदा करते हैं।
भारत में लाखों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समुद्र और तटीय गतिविधियों से जुड़े हैं। मत्स्य पालन से लेकर बंदरगाह, शिपिंग और पर्यटन तक कई क्षेत्रों में रोजगार की बड़ी संभावनाएं हैं।
इसके अलावा समुद्री नवीकरणीय ऊर्जा, समुद्री जैव प्रौद्योगिकी और गहरे समुद्र में वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे नए क्षेत्र भविष्य में भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं।
डीप ओशन मिशन से क्या है कनेक्शन?
भारत ने समुद्र की गहराई में मौजूद संसाधनों और वैज्ञानिक संभावनाओं को समझने के लिए डीप ओशन मिशन पर भी काम शुरू किया है। इसका उद्देश्य गहरे समुद्र की खोज, समुद्री विज्ञान, तकनीक और संसाधनों से जुड़ी क्षमताओं को बढ़ाना है।
यह ब्लू इकोनॉमी के उस हिस्से से जुड़ता है, जिसमें समुद्री संसाधनों का वैज्ञानिक और जिम्मेदार तरीके से उपयोग करने की संभावनाएं तलाशना शामिल है।
विकसित भारत के विजन में क्यों अहम है ब्लू इकोनॉमी?
जिस तरह ग्रीन इकोनॉमी पर्यावरण के अनुकूल विकास पर जोर देती है, उसी तरह ब्लू इकोनॉमी समुद्री संसाधनों के इस्तेमाल के साथ समुद्री पर्यावरण के संरक्षण की बात करती है।
भारत के लिए इसका मतलब सिर्फ समुद्र से ज्यादा आर्थिक लाभ कमाना नहीं है, बल्कि मछुआरों की आजीविका, समुद्री व्यापार, पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा, वैज्ञानिक अनुसंधान और समुद्री पर्यावरण—इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना है।
यही वजह है कि विकसित भारत के लिए पीएम मोदी की ‘शक्ति की सप्तधारा’ में ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी को जगह मिलना आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री क्षमता और टिकाऊ विकास की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।