दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस की Facial Recognition System (FRS) अब सवालों के घेरे में है। पुलिस ने दावा किया था कि प्रदर्शन के दौरान कैमरों और फेस रिकग्निशन तकनीक की मदद से 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस के पास मौजूद था। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया है कि इनमें कुछ लोग उस समय जेल में बंद थे।
इन मामलों ने पुलिस की तकनीक की सटीकता और उसके आधार पर की जा रही कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामने आए मामलों में लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े एक आरोपी योगेश का नाम भी शामिल है, जिसे पुलिस सिस्टम ने जंतर-मंतर प्रदर्शन में मौजूद बताया, जबकि रिकॉर्ड के मुताबिक वह उस दौरान जेल में था।
जेल में था योगेश, फिर प्रदर्शन में कैसे दिखा?
रिपोर्ट के मुताबिक योगेश लॉरेंस बिश्नोई का सहयोगी बताया जाता है और उसे 2024 में एक जिम मालिक की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था। वह तिहाड़ जेल में बंद था। इसके बावजूद दिल्ली पुलिस के Facial Recognition System ने उसे जंतर-मंतर प्रदर्शन में मौजूद लोगों में शामिल कर दिया।
यही मामला अब Facial Recognition System की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। अगर कोई व्यक्ति जेल में बंद है, तो उसके प्रदर्शन स्थल पर मौजूद होने की पहचान किस आधार पर हुई, यह जांच का विषय बन गया है।
2,873 लोगों की हुई थी पहचान
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में कहा था कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान Facial Recognition System के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की गई, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड पुलिस के आधिकारिक डेटाबेस में मौजूद था। इनमें से 2,402 लोगों की पहचान Crime Kundli Database और 471 लोगों की पहचान डोजियर रिकॉर्ड के जरिए होने की बात कही गई थी।
पुलिस के मुताबिक यह सिस्टम किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अपने आप कार्रवाई नहीं करता। पहले सिस्टम से संभावित पहचान होती है और इसके बाद मौके पर जाकर उसकी पुष्टि की जाती है।
25 ऐसे लोग मिले जो जेल में थे
इंडियन एक्सप्रेस की जांच में 2,873 लोगों में से कम से कम 25 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जो प्रदर्शन के दौरान जेल में बंद थे। इनमें 17 लोग हत्या, 4 लोग रेप और 4 लोग हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में आरोपी थे।
इससे यह सवाल उठता है कि पुलिस की Facial Recognition System ने इन लोगों के चेहरे को प्रदर्शन में मौजूद लोगों से किस आधार पर मैच किया।
पुलिस ने कहा- केवल FRS के आधार पर नहीं होगी कार्रवाई
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि Facial Recognition System से मिलने वाला मैच अंतिम सबूत नहीं माना जाता। पुलिस के मुताबिक इसके बाद संबंधित व्यक्ति की फील्ड वेरिफिकेशन की जाती है।
दिल्ली पुलिस ने कहा, “Facial Recognition System किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का अंतिम आधार नहीं है। पहले चेहरे की पहचान होती है और इसके बाद फील्ड वेरिफिकेशन किया जाता है। व्यक्ति के वास्तव में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद होने की पुष्टि होने के बाद ही कार्रवाई की जाती है।”
पुलिस का कहना है कि सिस्टम का इस्तेमाल मुख्य रूप से ऐसे लोगों की पहचान के लिए किया जाता है जिनका गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड पहले से पुलिस डेटाबेस में दर्ज है।
तकनीक की सटीकता पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल
जंतर-मंतर पर Facial Recognition System के इस्तेमाल को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। जुलाई में दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर लगे CCTV कैमरों और मोबाइल सर्विलांस वैन के जरिए लाइव फेस रिकग्निशन का इस्तेमाल करने की पुष्टि की थी। पुलिस का कहना था कि इसका उद्देश्य भीड़ में मौजूद ज्ञात अपराधियों की पहचान करना था।
वहीं विशेषज्ञों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने Facial Recognition Technology के गलत मैच यानी false positive की संभावना को लेकर चिंता जताई है। खराब तस्वीर, चेहरे का एंगल, रोशनी और भीड़ जैसी परिस्थितियां किसी व्यक्ति की गलत पहचान का कारण बन सकती हैं।
अब बड़ा सवाल- गलती तकनीक की या डेटा की?
जेल में बंद लोगों का प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बताए जाने के मामलों ने पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि पुलिस का कहना है कि FRS केवल शुरुआती पहचान का माध्यम है और कार्रवाई से पहले मानव स्तर पर सत्यापन किया जाता है।
लेकिन अगर शुरुआती पहचान ही गलत हो, तो उस आधार पर तैयार होने वाला पूरा डेटा और आगे की जांच भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में जंतर-मंतर मामले ने दिल्ली पुलिस की Facial Recognition Technology के इस्तेमाल, उसकी सटीकता और उसके आधार पर कार्रवाई की प्रक्रिया पर नई बहस छेड़ दी है।