भारतीय राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल मची हुई है। संसद का बजट सत्र जारी है, लेकिन मुख्य चर्चा बजट से ज़्यादा इस बात पर केंद्रित हो गई है कि क्या विपक्ष लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को उनके पद से हटा पाएगा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी दलों ने ओम बिरला पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने के लिए प्रस्ताव (Removal Motion) लाने की तैयारी कर ली है। आइए समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है, नियमों का गणित क्या कहता है, और संख्या बल किसके पक्ष में है।
विपक्ष, खासकर कांग्रेस, स्पीकर ओम बिरला के सदन संचालन के तरीके से नाराज़ है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि स्पीकर का व्यवहार निष्पक्ष नहीं है और वह सत्ता पक्ष—यानी सरकार के इशारे पर काम करते हैं। विवाद तब और बढ़ गया जब विपक्ष ने यह आरोप लगाया कि जब भी उनके नेता राहुल गांधी सदन में बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो स्पीकर उन्हें टोक देते हैं या पर्याप्त मौका नहीं देते। विपक्षी सदस्यों ने ओम बिरला के व्यवहार को ‘स्कूल के मास्टर’ जैसा बताया, जो उन्हें ‘बैठ जाइए’ या ‘अनुशासन में रहिए’ कहकर नियंत्रित करते हैं। इसी नाराजगी के चलते अब विपक्षी खेमे में स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोलने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया और संख्या बल
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 94 (Article 94) के तहत की जाती है, जिसे तकनीकी भाषा में ‘अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव’ (Motion of Removal of Speaker) कहा जाता है।
1. नियम और नोटिस: इस प्रस्ताव को सदन में पेश करने के लिए कम से कम 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या है (खबरों के अनुसार 102 सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं)। हालांकि, प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग के लिए 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य होता है, जिसका मतलब है कि यह प्रक्रिया बजट सत्र के दूसरे चरण (मार्च) में ही पूरी हो पाएगी।
2. बहुमत का गणित: असली चुनौती प्रस्ताव को पास कराने में है। लोकसभा में किसी भी प्रस्ताव को पास कराने के लिए साधारण बहुमत यानी 272 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। अगर हम पूरे I.N.D.I.A. गठबंधन के सांसदों को मिला भी लें, तो उनके पास लगभग 234 सांसदों का ही समर्थन है। जबकि, भाजपा अपने सहयोगी दलों—जैसे टीडीपी और जेडीयू—के साथ मिलकर बहुमत का आंकड़ा पहले ही पार कर चुकी है। संख्या बल को देखते हुए यह प्रस्ताव वोटिंग में निश्चित रूप से गिर जाएगा।
राजनीतिक संदेश देने की रणनीति
चूंकि कांग्रेस और विपक्षी दलों को यह बात बहुत अच्छे से पता है कि उनके पास संख्या बल नहीं है, इसलिए यह कदम ओम बिरला की कुर्सी हटाने से ज़्यादा राजनीतिक संदेश देने के लिए उठाया गया है। राहुल गांधी को बोलने न देने का मुद्दा विपक्ष के लिए एक राजनीतिक हथियार बन गया है। वे देश को यह दिखाना चाहते हैं कि सरकार किस तरह से लोकतंत्र और विपक्ष की आवाज़ को दबा रही है। इस प्रस्ताव के जरिए विपक्ष सत्ता पक्ष को घेरने और जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने का भरसक प्रयास कर रहा है, भले ही इतिहास गवाह है कि आज तक भारत में किसी भी स्पीकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव पास नहीं हो पाया है।
संख्या बल के कारण लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की कुर्सी को कोई खतरा नहीं है। हालांकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव के जरिए सरकार और स्पीकर पर दबाव बनाने में सफलता हासिल की है। यह घटनाक्रम साफ इशारा करता है कि संसद के भीतर की राजनीतिक तकरार आने वाले दिनों में और भी तीखी होने वाली है।





