भारतीय क्रिकेट टीम की आक्रामक बल्लेबाजी अब दुनिया भर में चर्चा का विषय है। नागपुर हो या गुवाहाटी, टीम इंडिया के बल्लेबाजों ने विपक्षी गेंदबाजों को खूब परेशान किया है। लेकिन क्या हर पिच पर सिर्फ ‘तबाही’ वाली बल्लेबाजी ही जीत दिला सकती है? हाल ही में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में जो हुआ, उसने टीम इंडिया को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने पर मजबूर कर दिया है। आज हम विश्लेषण करेंगे कि कैसे भारतीय टीम अपनी आक्रामक पहचान को बरकरार रखते हुए परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की चुनौती का सामना कर रही है।
भारतीय टीम ने साल की शुरुआत से ही अपने इरादे साफ कर दिए हैं। हमने नागपुर में न्यूजीलैंड के खिलाफ 238 रनों का विशाल स्कोर देखा, तो गुवाहाटी में सिर्फ 10 ओवर में 155 रन का तूफानी प्रदर्शन भी। सहायक कोच रयान टेन डोएशेट का भी मानना है कि मौजूदा दौर में बल्लेबाजों की पहली सोच सिर्फ छक्का लगाने की होती है, और आक्रामकता भारतीय टीम के ‘डीएनए’ का हिस्सा बन चुकी है। भारतीय टीम को यह भरोसा है कि उनके विश्वस्तरीय गेंदबाज बल्लेबाजों को जोखिम लेने की आजादी देते हैं।
हालांकि, मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में अमेरिका के खिलाफ टीम की यह सीधी आक्रामक रणनीति विफल हो गई। धीमी और चिपचिपी पिच पर सटीक गेंदबाजी के सामने भारत का टॉप ऑर्डर लड़खड़ा गया। इस हार के बाद कप्तान सूर्यकुमार यादव ने स्वीकार किया कि जब स्कोर 77 रन पर 6 विकेट था, तब टीम पर भारी दबाव था और वहाँ टीम को थोड़ी और समझदारी दिखाने की सख्त जरूरत थी। ईशान किशन और शिवम दुबे धीमी गेंदों में फंसे, जबकि रिंकू सिंह और हार्दिक पांड्या भी दबाव में अपनी टाइमिंग खो बैठे।
सहायक कोच रयान टेन डोएशेट ने स्पष्ट किया कि आक्रामकता आवश्यक है, लेकिन 70 रन पर 6 विकेट गिरने के बाद संयम और रणनीतिक बदलाव की सख्त जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि टॉप ऑर्डर को अपनी मूल शैली बदलने की जरूरत नहीं है, बस उन्हें हालात के मुताबिक खुद को ढालना होगा और थोड़ा संभलकर खेलने की जरूरत है। अब नामीबिया के खिलाफ अगले मैच से पहले भारतीय टीम के सामने यही चुनौती है कि वह आक्रामकता और पिच के मिजाज़ को पढ़ने के बीच सही संतुलन कैसे स्थापित करती है।
यह देखना रोमांचक होगा कि क्या टीम इंडिया आने वाले मुकाबलों में पिच के मिजाज़ को भांपकर अपनी रणनीति में सूक्ष्म बदलाव करती है और चैंपियन वाली समझदारी दिखाती है। आपको क्या लगता है, क्या हर परिस्थिति में सिर्फ आक्रामक ही रहना चाहिए? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर दें।









