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बीएचयू के शोध में बड़ी उपलब्धि: अल्सरेटिव कोलाइटिस के इलाज में बिना सर्जरी अल्ट्रासाउंड से पता चलेगा असर


आंतों की गंभीर बीमारी Ulcerative Colitis से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की खबर सामने आई है। Banaras Hindu University (बीएचयू) के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में बताया है कि अब बीमारी की गंभीरता जानने के लिए हर बार दर्दनाक एंडोस्कोपी कराने की आवश्यकता कम हो सकती है।

शोध के अनुसार इंटेस्टाइनल अल्ट्रासाउंड (आईयूएस) और फीकल कैलप्रोटेक्टिन (एफसी) जैसे परीक्षण भी बीमारी की सक्रियता का सटीक आकलन करने में सक्षम हैं। इन दोनों तकनीकों की खास बात यह है कि ये पूरी तरह गैर-आक्रामक हैं, यानी इनमें किसी तरह की चीर-फाड़ या जटिल प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती।

अब तक अल्सरेटिव कोलाइटिस की स्थिति का पता लगाने के लिए एंडोस्कोपी को सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता था। हालांकि यह प्रक्रिया कई मरीजों के लिए असुविधाजनक और महंगी साबित होती है। बीएचयू के विशेषज्ञों के इस अध्ययन से मरीजों को भविष्य में अधिक सरल और किफायती विकल्प मिल सकता है।

शोध के दौरान विशेषज्ञों ने 60 मरीजों पर अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि आंत की दीवार की मोटाई और मल में कैलप्रोटेक्टिन का स्तर बीमारी की गंभीरता से सीधे जुड़ा हुआ है। यदि आंत की दीवार की मोटाई तीन मिलीमीटर से अधिक हो या मल में कैलप्रोटेक्टिन का स्तर 250 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम से ऊपर हो, तो करीब 92.3 प्रतिशत संवेदनशीलता के साथ बीमारी की सक्रियता का पता लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक इन परीक्षणों की मदद से इलाज शुरू होने से पहले और बाद में मरीज की स्थिति पर आसानी से निगरानी रखी जा सकती है। इससे यह भी पता चल सकेगा कि दी जा रही दवा या उपचार का मरीज पर कितना असर हो रहा है। लगभग 94.2 प्रतिशत विशिष्टता के साथ यह तकनीक डॉक्टरों को अधिक सटीक उपचार योजना बनाने में मदद कर सकती है।

यह शोध इटली के जर्नल ऑफ अल्ट्रासाउंड में प्रकाशित हुआ है। शोध दल में गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभागाध्यक्ष Devesh Prakash Yadav, S. K. Shukla, Shishirendu Parihar और Ashish Verma समेत कुल 10 शोधकर्ता शामिल रहे।

शोधकर्ताओं के अनुसार इंटेस्टाइनल अल्ट्रासाउंड और फीकल कैलप्रोटेक्टिन जांच से न केवल अल्सरेटिव कोलाइटिस बल्कि कई अन्य बीमारियों की भी पहचान संभव है। अल्ट्रासाउंड से अपेंडिसाइटिस, आंतों में रुकावट, डायवर्टिकुलाइटिस, आंतों के कैंसर और पेट के हर्निया की जांच की जा सकती है, जबकि फीकल कैलप्रोटेक्टिन टेस्ट से आंतों के संक्रमण, सीलिएक रोग और कोलोरेक्टल कैंसर की शुरुआती पहचान में मदद मिलती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध मध्यम से गंभीर अल्सरेटिव कोलाइटिस के मरीजों के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकता है और भविष्य में एंडोस्कोपी के पूरक विकल्प के रूप में व्यापक रूप से उपयोगी साबित हो सकता है।

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