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प्रयागराज के लोकगायक श्रीकांत वैश्य ने ‘झुलनी का रंगा सांचा…’ लोकगीत से रच दी अमर पहचान

प्रयागराज सिर्फ संगम और धार्मिक आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोक-संस्कृति और संगीत परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी परंपरा को अपनी आवाज़ से नई पहचान देने वाले दृष्टिहीन लोकगायक श्रीकांत वैश्य आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह रखते हैं।

उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्रीकांत वैश्य का नाम सुनते ही लोगों के मन में उनका लोकप्रिय लोकगीत ‘झुलनी का रंगा सांचा हमार पिया…’ गूंज उठता है। यह गीत आज भी उतना ही प्रिय है जितना पहले था।

1979 में पहली बार सुना यह लोकगीत

श्रीकांत वैश्य बताते हैं कि वर्ष 1979 में उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। उनके भाई उन्हें हनुमानगंज क्षेत्र के बरेठी गांव लेकर गए थे। वहां धान की रोपाई के दौरान ग्रामीण महिलाएं यह गीत गा रही थीं। गीत की धुन और भाव ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।

बाद में उन्होंने इसे टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड किया और अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। जब यह गीत आकाशवाणी से प्रसारित हुआ, तो देखते ही देखते लोगों की जुबान पर चढ़ गया और उन्हें नई पहचान मिली।

लोकगीत से मिली देशभर में प्रसिद्धि

वर्ष 1980 में इस गीत का एल्बम तैयार हुआ, जिसने श्रीकांत वैश्य को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। प्रसिद्ध लेखक चंद्रशेखर मिश्र के सहयोग से गीत को अंतिम रूप मिला और यह लोकसंगीत की पहचान बन गया।

संघर्षों से भरा जीवन

श्रीकांत वैश्य का जन्म 3 मई 1949 को रायबरेली के जायस में हुआ। बचपन में चेचक की बीमारी के कारण छह साल की उम्र में उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी, लेकिन संगीत के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।

उन्होंने प्रयाग संगीत समिति से शिक्षा शुरू की और किराना घराने के प्रसिद्ध संगीताचार्य पंडित रामाश्रय झा से शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं।

संगीत की पढ़ाई और साधना के लिए उनकी मां पार्वती देवी ने अपने गहने गिरवी रख दिए थे, जो उनके संगीत सफर की सबसे बड़ी प्रेरणा बने।

गुरु के रूप में भी पहचान

आज श्रीकांत वैश्य न केवल गायक हैं, बल्कि गुरु के रूप में भी जाने जाते हैं। उनके सैकड़ों शिष्य देश और विदेश में संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं।

लोकसंस्कृति को बचाने की अपील

श्रीकांत वैश्य का मानना है कि बदलते दौर में लोककलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। उन्होंने सरकार और समाज से लोकसंगीत और लोकसंस्कृति को बचाने का आह्वान किया है।

प्रमुख उपलब्धियां

वर्षउपलब्धि
1979‘झुलनी का रंगा सांचा’ का आकाशवाणी से प्रसारण
1997आकाशवाणी द्वारा ‘ए ग्रेड’ कलाकार का दर्जा
2024आकाशवाणी का ‘टॉप ग्रेड’ कलाकार सम्मान
2026उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

श्रीकांत वैश्य की मधुर आवाज और समर्पण आज भी लोकसंगीत प्रेमियों के दिलों में अमर हैं।

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