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दिल्ली से लखनऊ तक: दो अग्निकांड, एक जैसी लापरवाही… जिम्मेदार कौन?

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दिल्ली से लखनऊ तक: दो अग्निकांड, एक जैसी लापरवाही... जिम्मेदार कौन?

दिल्ली के मालवीय नगर और लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर फायर सेफ्टी व्यवस्था की पोल खोल दी है। दोनों हादसों में अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही सामने आई, जिसकी कीमत मासूम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

भारत में हर बड़ी त्रासदी के बाद एक सवाल बार-बार उठता है कि आखिर जिम्मेदार कौन है? लेकिन दुखद बात यह है कि हर हादसे के बाद जवाब बदल जाते हैं, जबकि कारण वही रहते हैं। लखनऊ के अलीगंज इलाके में स्थित एक बिल्डिंग में लगी आग ने दिल्ली मालवीय नगर हादसे की यादों को फिर से ताजा कर दिया, दिल्ली के मालवीय नगर में हुए होटल अग्निकांड और लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड के बीच सैकड़ों किलोमीटर की दूरी जरूर है, लेकिन दोनों घटनाओं की जांच में सामने आई खामियां लगभग एक जैसी हैं।

एक तरफ लखनऊ में 15 छात्रों और कर्मचारियों की जान चली गई, तो दूसरी तरफ दिल्ली के मालवीय नगर में भी लोगों ने आग और धुएं के बीच तड़पकर दम तोड़ा। दोनों घटनाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारत के कई शहरों में फायर सेफ्टी नियम केवल कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर अवैध निर्माण, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही लोगों की जान ले रही है।

लखनऊ अग्निकांड ने फिर खोली सिस्टम की पोल

लखनऊ के अलीगंज स्थित कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में लगी आग ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। आग उस समय लगी जब बिल्डिंग में स्थित एनिमेशन स्टूडियो और कोचिंग सेंटर में बड़ी संख्या में छात्र और कर्मचारी मौजूद थे। देखते ही देखते धुएं ने पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया। अंदर फंसे लोग मदद के लिए चीखते रहे, कुछ बाथरूम में छिप गए, तो कुछ ने खिड़कियों से कूदकर जान बचाने की कोशिश की। लेकिन इमारत की सबसे बड़ी खामी यह थी कि अंदर आने और बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता था। जब वही रास्ता धुएं और आग की चपेट में आ गया तो दर्जनों लोग ऊपरी मंजिलों में फंस गए। नतीजा यह हुआ कि 15 लोगों की जान चली गई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

मालवीय नगर हादसे में भी दोहराई गई थी वही गलती

दिल्ली के मालवीय नगर में हुए होटल अग्निकांड की जांच में भी यही तथ्य सामने आया था। होटल में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक रास्ता था। इतना ही नहीं, बेसमेंट में मौजूद एक वैकल्पिक गेट पर ताला लगा हुआ था। जब आग फैली तो लोग सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पाए। धुएं ने कुछ ही मिनटों में पूरे भवन को घेर लिया और कई लोग अंदर ही फंस गए।
फायर सेफ्टी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी व्यावसायिक भवन में एकमात्र एग्जिट होना खुद में बड़ा सुरक्षा खतरा है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुसार बहुमंजिला इमारतों में कम से कम दो सुरक्षित निकासी मार्ग अनिवार्य माने जाते हैं।

रिहायशी नक्शा, लेकिन कमर्शियल इस्तेमाल

लखनऊ मामले की जांच में सामने आया है कि भवन मालिकों ने रिहायशी भवन का नक्शा पास कराया था, लेकिन बाद में वहां व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स विकसित कर दिया गया। यह केवल तकनीकी अनियमितता नहीं बल्कि सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है। रिहायशी भवन और व्यावसायिक भवन के सुरक्षा मानक पूरी तरह अलग होते हैं। व्यावसायिक उपयोग के लिए अधिक क्षमता वाले बिजली कनेक्शन, फायर फाइटिंग सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट और नियमित सुरक्षा ऑडिट आवश्यक होते हैं। दिल्ली के मालवीय नगर होटल में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। वहां होटल मालिक को सीमित निर्माण की अनुमति मिली थी, लेकिन उसने नियमों को दरकिनार करते हुए क्षमता से कई गुना अधिक कमरे बना लिए, दोनों मामलों में एक समानता साफ दिखाई देती है—अनुमति कुछ और, निर्माण कुछ और।

बेसमेंट बना मौत का गोदाम

लखनऊ अग्निकांड की जांच में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ। कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में अवैध रूप से कपड़ों का बड़ा गोदाम संचालित किया जा रहा था, गारमेंट्स और कपड़े अत्यधिक ज्वलनशील सामग्री माने जाते हैं। ऐसे गोदाम में आग लगने पर धुआं और जहरीली गैसें बहुत तेजी से फैलती हैं। यही वजह रही कि आग लगने के बाद कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत धुएं से भर गई। फायर कर्मियों को घंटों की मशक्कत के बाद आग पर काबू मिला। बेसमेंट में जमा पानी निकालने के लिए भी अतिरिक्त संसाधनों का इस्तेमाल करना पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बेसमेंट में अवैध रूप से ज्वलनशील सामग्री न रखी गई होती तो नुकसान का स्तर काफी कम हो सकता था।

आरोपियों के पुराने विवादित रिकॉर्ड भी आए सामने

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे बिल्डिंग मालिकों के पुराने विवाद भी सामने आ रहे हैं। अलीगंज अग्निकांड में सह-मालिक सुरेंद्र शुक्ल का नाम वर्ष 2015 के सीपीएमटी पेपर लीक मामले में भी चर्चा में रहा था। हालांकि उस मामले में उन्हें कानूनी राहत मिल गई थी, लेकिन उनका नाम विवादों से जुड़ा रहा। इसके अलावा उन पर और उनके परिवार पर किसानों से कम कीमत पर जमीन खरीदकर बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग करने के आरोप भी लगते रहे हैं, दूसरी ओर, दिल्ली मालवीय नगर अग्निकांड के आरोपी होटल मालिक लवकेश बजाज का भी आपराधिक रिकॉर्ड सामने आया। जांच एजेंसियों के अनुसार उसे पहले फर्जी दस्तावेज तैयार कराने से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया जा चुका था।
इन दोनों मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बार-बार विवादों में रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर प्रशासन पर्याप्त निगरानी रख रहा था?

नियमों की अनदेखी ने छीनी दर्जनों जिंदगियां

लखनऊ की इमारत में मौजूद एकमात्र सीढ़ी पहले से ही बेहद संकरी थी। जांच में पता चला कि इसी रास्ते के ऊपर इलेक्ट्रिक कंट्रोल पैनल, एग्जॉस्ट फैन और अन्य उपकरण लगा दिए गए थे, जिससे निकासी मार्ग और संकरा हो गया। जब आग लगी तो यही रास्ता धुएं का मुख्य स्रोत बन गया। लोगों के लिए बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया। सबसे चिंताजनक तथ्य यह था कि पूरी इमारत में कोई इमरजेंसी एग्जिट मौजूद नहीं था, यानी भवन में मौजूद सैकड़ों लोगों की सुरक्षा एकमात्र रास्ते पर निर्भर थी।

हादसे के बाद जागा प्रशासन

हर बड़े हादसे की तरह इस मामले में भी प्रशासनिक कार्रवाई घटना के बाद शुरू हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल उच्चस्तरीय एसआईटी का गठन किया। लखनऊ विकास प्राधिकरण, बिजली विभाग और फायर विभाग के चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर चार आरोपियों को गिरफ्तार भी किया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इमारत में इतनी गंभीर खामियां मौजूद थीं तो वर्षों तक किसी अधिकारी की नजर उस पर क्यों नहीं गई?
क्या निरीक्षण नहीं हुए? क्या शिकायतें नहीं मिलीं? या फिर नियमों की अनदेखी को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?

दिल्ली और लखनऊ की कहानी आखिर एक जैसी क्यों?

दिल्ली और लखनऊ के इन दोनों अग्निकांडों को यदि एक साथ देखा जाए तो कई समानताएं सामने आती हैं।

  • दोनों जगह अवैध निर्माण था।
  • दोनों जगह सुरक्षा मानकों की अनदेखी हुई।
  • दोनों जगह पर्याप्त निकासी मार्ग नहीं थे।
  • दोनों जगह प्रशासनिक निगरानी कमजोर दिखाई दी।
  • दोनों जगह हादसे के बाद ही कार्रवाई शुरू हुई।

यानी समस्या किसी एक शहर या एक इमारत की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम में मौजूद खामियों की है।

क्या अब भी नहीं लिया गया सबक?

भारत में पिछले कई वर्षों में अस्पतालों, कोचिंग सेंटरों, होटलों, फैक्ट्रियों और व्यावसायिक भवनों में आग लगने की कई बड़ी घटनाएं सामने आई हैं। हर बार जांच होती है, कार्रवाई होती है, कुछ अधिकारियों को निलंबित किया जाता है और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है। लेकिन जब तक भवन सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन नहीं होगा, नियमित फायर ऑडिट नहीं होंगे और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ समय रहते कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे। लखनऊ और दिल्ली के अग्निकांड केवल दुर्घटनाएं नहीं हैं। ये उन खामियों का आईना हैं जो वर्षों से सिस्टम के भीतर मौजूद हैं। 31 से अधिक लोगों की मौत के बाद भी यदि व्यवस्था नहीं बदली तो आने वाले समय में किसी और शहर से ऐसी ही दर्दनाक खबर आने में देर नहीं लगेगी। क्योंकि आग केवल इमारतों को नहीं जलाती, वह प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी की परतों को भी उजागर कर देती है।

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