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एआई क्रांति: दिल्ली में हुई दुनिया की सबसे बड़ी ‘डिजिटल सरकार’ की बैठक, क्या भारत बचाएगा अपना भविष्य?

दिल्ली में हुई दुनिया की सबसे बड़ी (1)
दिल्ली में हुई दुनिया की सबसे बड़ी (1)

सोचिए, अगर कल सुबह आपको पता चले कि आपकी नौकरी, आपकी पढ़ाई और आपका बैंक अकाउंट भी किसी मशीन के हाथ में चला गया है? यह कोई दूर का भविष्य नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया आज दिल्ली में उतर चुकी है। हाल ही में, भारत की राजधानी में दुनिया के सबसे बड़े AI इम्पैक्ट समिट का आयोजन किया गया, जो पहली बार किसी विकासशील देश में हुआ। इस सम्मेलन में यह तय किया जा रहा था कि अगले 20-30 सालों में दुनिया कैसे जिएगी। सवाल यह है कि जब दुनिया के सबसे बड़े टेक दिग्गज दिल्ली में जुटे, तो क्या भारत ने सिर्फ यूज़र बनने के बजाय, दुनिया को दिशा दिखाने का मौका लपक लिया है?

यह समिट इसलिए खास था क्योंकि यह चौथा ग्लोबल एआई समिट था, और पहली बार ब्रिटेन, फ्रांस और साउथ कोरिया जैसे विकसित देशों से बाहर भारत में आयोजित हुआ। इस ग्लोबल मीटिंग में 135 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधि, 20 से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और दुनिया की 100 से ज़्यादा बड़ी टेक कंपनियां शामिल हुईं। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, ओपन एआई के सीईओ सैम वाल्टमैन और माइक्रोसॉफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स जैसे लोग, जो असल में दुनिया की ‘डिजिटल सरकार’ चलाते हैं, वे सभी दिल्ली में मौजूद थे।

मानवता के लिए एआई: भारत का मंत्र और सात चक्र

भारत ने इस मंच का उपयोग ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनने के लिए किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समिट का उद्घाटन किया और स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अब नियम बनाने वाली टेबल पर बैठना चाहता है। उन्होंने घोषणा की कि एआई का मंत्र ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ होना चाहिए, यानी एआई सिर्फ मुनाफ़ा कमाने या ताकत दिखाने का तरीका न बने, बल्कि यह उस किसान, मज़दूर और छात्र तक भी पहुंचे जिसे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। भारत ने अपनी सनातन परंपरा के ‘सात चक्रों’ की अवधारणा पर आधारित एआई के भविष्य को दिशा देने के लिए सात प्रमुख विचार दिए, जिनमें प्रमुख थे: एआई सुरक्षित और भरोसेमंद हो, यह सबके लिए उपलब्ध हो, और इसका उपयोग देश की तरक्की और लोगों की भलाई के लिए किया जाए।

डिजिटल गुलामी का खतरा और भारत की चुनौती

आंकड़ों की भाषा बताती है कि भारत एआई इस्तेमाल करने में भले ही अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर हो (लगभग 10 करोड़ भारतीय ChatGPT जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं), लेकिन हम अभी भी इस दौड़ में पीछे हैं। माइक्रोसॉफ्ट की रिपोर्ट के अनुसार, एआई इस्तेमाल करने वाले देशों की लिस्ट में भारत 69वें नंबर पर है। सबसे बड़ा अंतर पेटेंट और तकनीक विकास में है। 2010 से 2023 के बीच, चीन ने दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत एआई पेटेंट हासिल किए हैं, जबकि भारत एआई बनाने वाला नहीं, बल्कि इस्तेमाल करने वाला देश बना हुआ है। यदि पेटेंट और कंट्रोल विदेशी कंपनियों के हाथ में रहा, तो हम ‘डिजिटल गुलामी’ की ओर बढ़ सकते हैं।

समाधान की दिशा: स्वदेशी AI और डेटा सेंटर

इस चुनौती का समाधान निकालने के लिए भारत सरकार ने बड़े कदम उठाए हैं। एआई बिना डेटा सेंटर के नहीं चलता, और भारत के पास अभी सिर्फ 276 डेटा सेंटर हैं (अमेरिका के पास 4000 हैं)। इसी को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने डेटा सेंटर लगाने वाली कंपनियों को 2047 तक टैक्स में छूट देने की घोषणा की है, ताकि विदेशी निवेश आकर्षित हो और डेटा देश के अंदर रहे। इसके अलावा, भारत ने अपना स्वदेशी एआई प्लेटफॉर्म ‘सर्वम’ विकसित किया है। यह प्लेटफॉर्म 22 भारतीय भाषाओं में काम कर सकता है, जो दिखाता है कि भारत अब सिर्फ कॉपी नहीं, क्रिएट भी कर सकता है। जिस तरह कारगिल युद्ध के दौरान GPS डेटा न मिलने से हमें सबक मिला था, उसी तरह अब एआई का कंट्रोल भी हमारे हाथों में होना अनिवार्य है।

यह AI इम्पैक्ट समिट सिर्फ एक टेक्नोलॉजी इवेंट नहीं था, यह भारत के भविष्य की परीक्षा थी। अगले 10 साल निर्णायक होंगे। यदि हमने रिसर्च, डेवलपमेंट और स्वदेशी नवाचार में बड़ा निवेश किया, तो भारत एआई की दुनिया में लीडर बन सकता है। लेकिन अगर हम सिर्फ ऐप डाउनलोड करने में खुश रहे, तो हम हमेशा के लिए ग्राहक बनकर रह जाएंगे और तकनीक की शर्तें कोई और तय करेगा।

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