इन दिनों सिनेमाघरों में एक ऐसी फिल्म चल रही है जो प्यार, कमज़ोरी और खुद से लड़ने की एक अनूठी कहानी पेश करने का दावा करती है। नाम है ‘दो दीवाने शहर में’। यह फिल्म मुंबई जैसे महानगर में अपने डर, झिझक और कमियों के साथ जी रहे दो युवाओं की कहानी बताती है। फिल्म का मुख्य संदेश है: ‘परफेक्ट होना ज़रूरी नहीं, अपनी कमियों के साथ खुद को अपनाना ही असली जीत है’। यह बात सुनने में बेहद खूबसूरत लगती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या फिल्म इस संदेश को पर्दे पर सही मायनों में उतार पाई है?
फिल्म ‘दो दीवाने शहर में’ 20 फरवरी 2026 को रिलीज़ हुई, जिसमें रवि उदयवार ने निर्देशन की कमान संभाली है। मुख्य भूमिका में सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर हैं, और साथ में कई जाने-माने सहायक कलाकार भी हैं। फिल्म की शुरुआती कमाई लगभग सवा करोड़ रुपये रही, जिसे एक ‘सॉफ्ट स्टार्ट’ कहा जा सकता है। यह न तो बहुत शानदार थी और न ही बहुत खराब, जिससे पता चलता है कि दर्शकों का उत्साह औसत ही रहा। फिल्म आगे बढ़ी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ा धमाका नहीं कर पाई।
कहानी की बात करें तो, फिल्म की शुरुआत दोनों किरदारों – शशांक और रोशनी – की पहली मुलाकात से होती है, जो एक अरेंज सेट-अप के तहत होती है। इसके बाद दोस्ती, प्यार, गलतफहमी, ब्रेकअप और फिर पैचअप का सिलसिला चलता है, जो हमने कई बार देखा है। शशांक को बोलने में दिक्कत है और रोशनी अपने लुक्स को लेकर असुरक्षित महसूस करती है। यह विचार आज के युवाओं की समस्याओं को दर्शाता है, लेकिन फिल्म इन गहरे मुद्दों को सतही तौर पर निपटा देती है, जिससे दर्शक भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। मृणाल ठाकुर की खूबसूरती को देखते हुए उनका खुद को बदसूरत मानना थोड़ा अजीब लगता है, और सिद्धांत चतुर्वेदी का स्टटर भी उतना वास्तविक नहीं लगता, क्योंकि वह स्क्रीन पर काफी आत्मविश्वासी दिखते हैं।
फिल्म में एक और बात जो ध्यान खींचती है, वह है ब्रांड प्रमोशन का अत्यधिक इस्तेमाल। बार-बार फूड डिलीवरी ऐप्स और प्रोडक्ट्स का दिखना कई बार फिल्म को एक विज्ञापन जैसा बना देता है, जिससे कहानी का प्रवाह बाधित होता है। कुछ दृश्य भी हैं जो आज के दौर में पुराने लगते हैं, जैसे लड़के का बार-बार लड़की का पीछा करना जिसे आज के समय में रोमांटिक नहीं माना जाता। ‘दो दीवाने शहर में’ बॉडी पॉजिटिविटी और आत्म-विश्वास की बात तो करती है, लेकिन केवल ऊपरी तौर पर। अगर इसमें थोड़ी और गहराई होती तो इसका प्रभाव कहीं अधिक होता। क्रिटिक्स ने भी यही कहा है कि फिल्म की सोच अच्छी है, संदेश भी अच्छा है, लेकिन प्रस्तुतीकरण में वह दम नहीं है, जिसके चलते इसे औसत रेटिंग मिली है।
साफ शब्दों में कहें तो, ‘दो दीवाने शहर में’ एक ‘मिस्ड ऑपर्च्युनिटी’ साबित हुई है। इससे एक बहुत अच्छी लव स्टोरी बन सकती थी, लेकिन कमज़ोर स्क्रिप्ट और धीमी गति ने सब बिगाड़ दिया। अगर आपको धीमी और हल्की-फुल्की रोमांटिक फिल्में पसंद हैं, तो आप इसे एक बार देख सकते हैं, यह टाइम पास के लिए ठीक है। लेकिन अगर आप दमदार कहानी, गहरे इमोशन और याद रहने वाली फिल्म चाहते हैं, तो यह आपको निराश कर सकती है।









