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‘ड्रोन जनरल’ उपेंद्र द्विवेदी : जिस अधिकारी ने भारतीय सेना की युद्ध रणनीति बदल दी

'ड्रोन जनरल'

‘ड्रोन जनरल’ उपेंद्र द्विवेदी : जिस अधिकारी ने भारतीय सेना की युद्ध रणनीति बदल दी

भारतीय सेना में उपनाम नहीं, सम्मान मिलता है और भारतीय सेना में किसी अधिकारी को उपनाम या निकनेम यूँ ही नहीं मिल जाता, काफी सालो का तजुर्बा और मेहनत लगती है ऐसा नाम बनाने में, यह सम्मान वर्षो की सेवा, नेतृत्व क्षमता, उपलब्दियों और संगठन पर छोड़े गए प्रभाव के आधार पर मिलता है। जब जनरल द्विवेदी को सेना के वरिष्ठ अधिकारियो और सैन्य हलकों में “ड्रोन जनरल” कहा जाने लगा, तो यह केवल एक लोकप्रिय संबोधन नहीं था, बल्कि उनके कार्यकाल में हुए सबसे बड़े सैन्य परिवर्तन की पहचान बन गया। यह उपनाम उस अधिकारी को मिला जिसने भारतीय सेना को पारंपरिक युद्ध अवधारणाओं से आगे बढ़कर तकनीक आधारित आधुनिक युद्ध प्रणाली की ओर ले जाने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में सेना ने न केवल ड्रोन तकनीक को अपनाया, बल्कि उन्होंने युद्ध लड़ने की पूरी सोच को बदल कर रख दिया।

21वी सदी के युद्ध अब केवल बंदूक, टैंक, तोप और सैनिकों की संख्या से नहीं जीते जाते। रूस-यूक्रेन युद्ध,पश्चिम एशिया के संघर्ष और विभिन्न क्षेत्रों में हुए सैन्य अभियानों ने साबित कर दिया है की ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और रियल-टाइम इंटेलिजेंस आधुनिक युद्ध की रीढ़ बन चुके है। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस बदलती वास्तविक्ता की समय रहते समझ किया था। उन्होंने महसूस किया की यदि भारतीय सेना को भविष्य के युद्ध के लिए तैयार रहना है, तो उसे नई तकनीक को तेजी से अपनाना होगा।यही सोच उनके कार्यकाल की आधारशिला बानी।

जब जनरल द्विवेदी ने ज़िम्मेदारी संभाली थी, तब भारतीय सेना के पास सीमित संख्या में ड्रोन मौजूद थे। इनका उपयोग मुख्य रूप से निगरानी और टोही मिशनों तक सीमित था। सेना के विभिन्न मोर्चो पर ड्रोन की तैनाती भी बहुत व्यापक नहीं थीं, लेकिन 30 जून 2026 को उनके सेवानिवृत्त होने तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। सेना के पास 50,000 से अधिक ड्रोन मौजूद है, जो विभिन्न सैन्य ज़रूरतों के अनुसार इस्तेमाल किये जा सकते थे। यह बदलाव छोटा नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी के स्तर का परिवर्तन माना जा रहा है।

उनके कार्यभार संभालने से पहले भारतीय सेना के पास केवल कुछ सौ ड्रोन थे, जिनका सीमित उपयोग होता था। लेकिन 30 जून 2026 को उनके सेवानिवृत्त होने तक यह संख्या बढ़कर 50,000 से अधिक हो गई। देशभर के सैन्य ठिकानों पर 25 से ज्यादा ड्रोन और काउंटर-ड्रोन हब स्थापित किए गए। साथ ही ऐसी आधुनिक प्रणाली विकसित की गई, जो करीब 500 किलोमीटर दूर तक सटीक निशाना साध सकती है। यह बदलाव छोटा नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी के स्तर का परिवर्तन माना जा रहा है। सेना ने अलग-अलग श्रेणियों के ड्रोन शामिल किए, जिनका उपयोग निगरानी, लक्ष्य पहचान, हमले, रसद आपूर्ति और युद्धक्षेत्र की वास्तविक समय की जानकारी जुटाने के लिए किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय सेना के इतिहास में यह सबसे बड़े तकनीक विस्तारों में से एक माना जा सकता है

जनरल द्विवेदी की सबसे बड़ी उपलब्धियों ड्रोन की संख्या बढ़ना नहीं मानी जाती। उनकी वास्तविक सफलता सेना की मानसिकता और कार्यशैली में बदलाव लाने में रही है। उन्होंने सैन्य नेतृत्व को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया की भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़े जायेंगे बल्कि युद्ध में सबसे बड़ा हाथ आधुनिक तकनीक, डेटा विश्लेषण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और और स्वायत्त प्रणालियां का होगा। इसी सोच के तहत उन्होंने सेना को नयी तकनीकों के प्रति खुला और अनुकूल बनाने की दिशा में काम किया। भारतीय सेना जैसे विशाल संगठन में बदलाव केवल उपकरण खरीदने से नहीं आता है. इसके लिए नीतिगत सुधर भी बहुत ज़रूरी होते है। जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में लगभग 25 नयी नीतियां, दिशानिर्देश और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किये गए है। इनका उद्देश्य सेना को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप ढालना है।

जनरल द्विवेदी के द्वारा बहुत साड़ी नीतियां सेना में शामिल की गयी इन नीतियों में शामिल प्रमुख क्षेत्र है जमीनी युद्ध की नई अवधारणाएं, अंतरिक्ष आधारित सैन्य संचालन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, रेड टीमिंग और युद्ध अभ्यास, बहुआयामी युद्ध रणनीति और उभरती सैन्य तकनीकों का उपयोग इन नीतियों से जनरल द्विवेदी ने भारतीय सेना को मजबूत किया है। इन सुधारो ने सेना को अधिक लचीला और तकनीक आधारित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसके अलावा भैरव बटालियन, अश्नि प्लाटून और दिव्यास्त्र बैटरियां जैसी नयी सैन्य इकाइयों का गठन किया गया, ताकि सेना आधुनिक तकनीक के साथ नए तरीके से युद्ध लड़ सके। यानी उन्होंने पुराणी सेना में सिर्फ ड्रोन नहीं जोड़े, बल्कि एक नयी सोच वाली सेना की नींव राखी

ऑपरेशन सिंदूर इस सैन्य की पहली नई रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा किसी भी सैन्य सुधार की वास्विकता सफलता युद्धक्षेत्र में ही साबित होती है।

ऑपेरशन सिंदूर इस नए सैन्य रणनीतिक की पहली बड़ी परीक्षा साबित हुआ। इस अभियान में ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और खुफिया जानकारी का एक साथ प्रभावी उपयोग किया गया। इस अभियान ने दिखाया की नयी रणनीतिक केवल कागज़ो तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक हालातों में भी सफल साबित हो सकती है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 50,000 ड्रोन होने से ही सेना पूरी तरह आधुनिक नहीं बन जाती। इसके लिए बेहतर रणनीतिक फैसले, तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और मजबूत रक्षा विनिर्माण व्यवस्था भी जरूरी है। जनरल द्विवेदी ने इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आत्मनिर्भरता, नागरिक-सैन्य सहयोग और सैन्य कूटनीति को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया।

सेवानिवृत्ति के बाद भी “ड्रोन जनरल” का यह नाम जनरल उपेंद्र द्विवेदी के साथ जुड़ा रहेगा। लेकिन इसकी असली अहमियत केवल उनके व्यक्तित्व में नहीं, बल्कि उस बदलाव में है जिसकी शुरुआत उन्होंने की। अब उनकी जगह आने वाले अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या यह बदलाव सिर्फ उनके कार्यकाल तक सीमित रहेगा, या फिर भारतीय सेना की स्थायी पहचान बन जाएगा।

यही तय करेगा कि “ड्रोन जनरल” का नाम इतिहास का सिर्फ एक यादगार अध्याय बनकर रह जाएगा या भारतीय सेना के आधुनिक बदलाव की लंबी कहानी की पहली कड़ी साबित होगा।

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