नई दिल्ली: किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात चर्चा में रही। इन मुलाकातों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर यह सवाल उठने लगा कि क्या रूस, चीन और भारत यानी RCI के बीच किसी नए रणनीतिक गठबंधन की संभावना बन रही है।
हालांकि, भारत की विदेश नीति को करीब से समझने वाले पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल का मानना है कि भारत किसी एक विशेष गुट का हिस्सा बनने की नीति नहीं अपना रहा है। उनका कहना है कि भारत की प्राथमिकता अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखना और रणनीतिक संतुलन कायम करना है।
किसी एक खेमे में शामिल होना भारत की नीति नहीं
कंवल सिब्बल के मुताबिक, भारत रूस और चीन के साथ सहयोग जरूर बढ़ाना चाहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह किसी ऐसे गठबंधन में शामिल होने जा रहा है जिसका उद्देश्य किसी तीसरे देश या समूह के प्रभाव को चुनौती देना हो।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर केंद्रित रही है। इसका मतलब है कि नई दिल्ली किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रिश्ते विकसित करती है।
भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूस, चीन और अन्य गैर-पश्चिमी देशों के साथ भी संवाद और सहयोग बनाए हुए है।
BRICS और SCO में भारत की सक्रिय भूमिका
भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है, जबकि 2017 में वह शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बना था। दोनों ही मंचों में भारत गैर-पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत करता है।
इसके बावजूद भारत की भागीदारी को किसी एक वैश्विक गुट में शामिल होने के तौर पर नहीं देखा जाता। भारत कई अलग-अलग बहुपक्षीय मंचों पर एक साथ सक्रिय है और प्रत्येक मंच पर अपने हितों के मुताबिक सहयोग करता है।
कंवल सिब्बल के मुताबिक, भारत रूस और चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के अलावा BRICS और SCO के साझा एजेंडे पर भी सहयोग करने के लिए तैयार है। लेकिन यह सहयोग किसी औपचारिक सैन्य या राजनीतिक गठबंधन का रूप ले, ऐसा भारत नहीं चाहता।
अमेरिका के साथ भी लगातार मजबूत हुए रिश्ते
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। रणनीतिक, रक्षा, तकनीक और आर्थिक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है।
इसके बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को भी पूरी तरह खत्म नहीं किया। ऊर्जा, रक्षा और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में रूस भारत का महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है।
यही संतुलन भारत की मौजूदा विदेश नीति की खासियत माना जाता है। नई दिल्ली एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सहयोग करती है, तो दूसरी ओर रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी अपने रिश्ते बनाए रखती है।
‘ग्लोबल साउथ’ पर भारत का जोर
भारत लगातार विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं यानी ग्लोबल साउथ के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। भारत का जोर है कि वैश्विक संस्थानों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
भारत के इस रुख को भी उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का हिस्सा माना जाता है। वह किसी एक शक्ति के नेतृत्व वाले वैश्विक मॉडल के बजाय बहुध्रुवीय दुनिया और अलग-अलग देशों के साथ सहयोग की वकालत करता है।
SCO में पीएम मोदी ने भी दोहराया भारत का रुख
SCO शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संघर्षों को लेकर भारत की पारंपरिक नीति दोहराई। उन्होंने कहा कि किसी भी विवाद का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए।
पीएम मोदी ने SCO के अगले 25 वर्षों के लिए रोडमैप तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने संगठन की 25वीं वर्षगांठ को भविष्य की दिशा तय करने का महत्वपूर्ण अवसर बताया।
RCI गठबंधन की चर्चा के बीच भारत का रुख साफ
पीएम मोदी की पुतिन और जिनपिंग के साथ मुलाकातों ने RCI यानी रूस-चीन-भारत के संभावित गठबंधन को लेकर अटकलों को जरूर हवा दी है। पश्चिमी देशों में भी इस तरह के किसी संभावित समीकरण के प्रभाव को लेकर चर्चा होती रही है।
लेकिन भारत का मौजूदा रुख स्पष्ट दिखाई देता है—नई दिल्ली किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय सभी प्रमुख शक्तियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखना चाहती है।
यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत को एक साथ अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर सहयोग करने की गुंजाइश देती है।