बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी? क्या है कांग्रेस-सपा का 32-21 फॉर्मूला, जिससे बदल सकती है यूपी की सियासत

कांग्रेस-सपा का 32-21 फॉर्मूला
कांग्रेस-सपा का 32-21 फॉर्मूला

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा के कथित ’32-21 फॉर्मूले’ की चर्चा तेज है, जिसमें सपा के वोट बैंक और दलित समर्थन को जोड़कर बीजेपी को चुनौती देने की रणनीति बताई जा रही है, हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जातीय समीकरण के साथ-साथ जनता का भरोसा, सरकारी योजनाएं और स्थानीय मुद्दे ही चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के गठजोड़ को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। विपक्ष की रणनीति का केंद्र इस बार ’32-21 फॉर्मूला’ है। यह फॉर्मूला केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश माना जा रहा है। कांग्रेस और सपा की सोच है कि यदि समाजवादी पार्टी अपना पारंपरिक वोट बैंक मजबूत बनाए रखे और कांग्रेस दलित समाज में अपनी पुरानी पकड़ वापस हासिल कर ले, तो बीजेपी को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह रणनीति जितनी आसान दिखती है, जमीन पर उतनी ही कठिन है।

क्या है 32-21 फॉर्मूला?

32-21 फॉर्मूले में 32 फीसदी समाजवादी पार्टी के मौजूदा वोट शेयर को माना जा रहा है, जबकि 21 फीसदी उत्तर प्रदेश की अनुमानित दलित आबादी का आंकड़ा है। विपक्ष का मानना है कि यदि इन दोनों सामाजिक और राजनीतिक आधारों को एक साथ लाया जा सके तो राज्य में बड़ा चुनावी समीकरण बन सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने करीब 33 फीसदी वोट शेयर हासिल कर अपनी स्थिति मजबूत की थी। वहीं कांग्रेस लगातार दलित, सामाजिक न्याय, संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दों पर अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रही है। ऐसे में दोनों दलों की रणनीति एक-दूसरे के पूरक बनने की दिखाई देती है।

अखिलेश यादव की ताकत क्या है?

समाजवादी पार्टी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में यादव और मुस्लिम वोट बैंक के सहारे राजनीति करती रही है। हालांकि हाल के वर्षों में अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का नारा देकर अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने की कोशिश की है।

2024 के चुनाव परिणामों ने यह संकेत जरूर दिया कि सपा अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की सबसे मजबूत पकड़ अब भी यादव और मुस्लिम वोटरों पर ही बनी हुई है।

राहुल गांधी की नजर दलित वोट बैंक पर

राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से लगातार सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना, आरक्षण और संविधान जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। वे दलित बस्तियों में जाकर संवाद करते हैं, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हैं और कांग्रेस को सामाजिक न्याय की पार्टी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

इसके पीछे राजनीतिक रणनीति भी साफ दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में करीब 21 फीसदी दलित आबादी है, जो कभी कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक हुआ करती थी। बाद में यह आधार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ चला गया और पिछले कुछ वर्षों में इसका एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ जुड़ गया। कांग्रेस अब इस खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश कर रही है।

दलित वोट सीधे सपा के साथ क्यों नहीं जुड़ता?

यही इस पूरे 32-21 फॉर्मूले की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में दलित और यादव समुदाय के बीच सामाजिक और स्थानीय स्तर पर लंबे समय से प्रतिस्पर्धा और तनाव देखने को मिलता रहा है, कुछ क्षेत्रों में दलित और मुस्लिम समुदाय के बीच भी स्थानीय विवाद और सामाजिक मतभेद सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि दलित समाज का एक बड़ा वर्ग समाजवादी पार्टी को सहज राजनीतिक विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं करता।

इसके अलावा विपक्षी दल वर्षों से समाजवादी पार्टी पर ‘यादववाद’ और ‘गुंडाराज’ जैसे आरोप लगाते रहे हैं। भले ही सपा इन आरोपों को खारिज करती रही हो, लेकिन राजनीति में जनधारणा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बीजेपी की रणनीति क्यों मजबूत मानी जा रही है?

2014 के बाद बीजेपी ने दलित समाज तक पहुंच बनाने के लिए केवल राजनीतिक संदेशों पर ही नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं पर भी जोर दिया। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, मुफ्त राशन और शौचालय जैसी योजनाओं का लाभ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक पहुंचा, जिनमें बड़ी संख्या दलित परिवारों की भी रही।

बीजेपी ने इसके साथ-साथ बाबा साहेब अंबेडकर, संत रविदास और अन्य महापुरुषों से जुड़े कार्यक्रमों को भी राजनीतिक और सामाजिक अभियान का हिस्सा बनाया। अनुसूचित जाति सम्मेलन, समरसता अभियान और दलित संपर्क कार्यक्रमों के जरिए पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की।

बसपा की कमजोरी किसे फायदा पहुंचाएगी?

बहुजन समाज पार्टी पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं दिखाई देती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसका पूरा वोट बैंक किसी एक पार्टी के खाते में चला जाएगा, दलित समाज कई उपजातियों में बंटा हुआ है, जिनमें जाटव, पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी और खटीक जैसे समुदाय शामिल हैं। हर क्षेत्र और हर समुदाय का मतदान व्यवहार अलग हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में अब भी बसपा का प्रभाव कायम है, जबकि कई इलाकों में बीजेपी मजबूत स्थिति में है। कांग्रेस भी अपनी वापसी की कोशिश में जुटी हुई है।

क्या सिर्फ जातीय समीकरण चुनाव जिताएगा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन अब चुनाव केवल जाति के आधार पर नहीं जीते जाते। मतदाता सरकारी योजनाओं, कानून-व्यवस्था, स्थानीय विकास, उम्मीदवार की छवि और सरकार के प्रदर्शन को भी अहम मानते हैं, यही वजह है कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल सामाजिक समीकरण बनाना पर्याप्त नहीं है। जनता का भरोसा जीतना और उसे बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

32-21 फॉर्मूला कितना कारगर साबित होगा?

कागज पर देखें तो समाजवादी पार्टी के मजबूत वोट बैंक और दलित आबादी का संभावित समर्थन विपक्ष के लिए बड़ा चुनावी समीकरण बन सकता है। लेकिन वास्तविक राजनीति केवल वोट जोड़ने का खेल नहीं है, कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह फिर से दलित समाज की भरोसेमंद राजनीतिक पसंद बन सकती है। वहीं समाजवादी पार्टी को यह विश्वास दिलाना होगा कि उसकी राजनीति केवल यादव समुदाय तक सीमित नहीं है। दूसरी ओर बीजेपी पिछले एक दशक में कल्याणकारी योजनाओं, संगठनात्मक मजबूती और सामाजिक पहुंच के जरिए जो आधार बना चुकी है, उसे चुनौती देना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा, यूपी की राजनीति में 32-21 फॉर्मूला चर्चा का विषय जरूर है, लेकिन इसकी असली परीक्षा चुनावी मैदान में ही होगी, जहां केवल गणित नहीं बल्कि जनता का भरोसा सबसे बड़ा फैसला करेगा।

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