कोलकाता में सूरज उगने से पहले ही राजनीतिक पारा चढ़ गया। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ताबड़तोड़ छापेमारी के बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का व्यक्तिगत हस्तक्षेप और ‘हरी फाइल’ को खुद निकाल कर लाना, अब पूरे देश की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गया है। यह हाई-प्रोफाइल ड्रामा सवाल उठा रहा है: क्या यह कानूनी कार्रवाई है या आगामी चुनावों से पहले TMC की रणनीति पर सीधा सियासी हमला?
ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी के मामले में कोलकाता समेत छह ठिकानों पर छापेमारी शुरू की थी। इन ठिकानों में I-PAC का कार्यालय और इसके निदेशक प्रतीक जैन का आवास भी शामिल था। सुबह 6 बजे शुरू हुई इस कार्रवाई के दौरान, सीएम ममता बनर्जी सीधे प्रतीक जैन के घर पहुंचीं और बताया जाता है कि वहां से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज लेकर बाहर निकलीं। यही ‘हरी फाइल’ अब TMC की चुनावी रणनीति, संभावित उम्मीदवारों की सूची और मतदाता डेटा से जुड़ी होने की अटकलों के कारण राजनीतिक गहमागहमी का विषय बनी हुई है।
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। ममता बनर्जी ने ED की कार्रवाई को ‘सियासी डकैती’ करार दिया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि यह कार्रवाई उन्हीं के इशारे पर हो रही है, जिसका उद्देश्य चुनाव से पहले टीएमसी के हार्ड डिस्क, फोन और गोपनीय दस्तावेज जब्त करना है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर अमित शाह बंगाल जीतना चाहते हैं, तो चुनाव मैदान में आएं और मुकाबला करें।
वहीं, ईडी ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग केस में सबूतों पर आधारित है और इसका किसी भी राजनीतिक दल या चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले में ममता बनर्जी का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह ED का राजनीतिक इस्तेमाल है और यह कदम लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करता है।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई यह घटना राजनीति और जांच एजेंसियों के बीच टकराव का नया आयाम पेश करती है। ‘हरी फाइल’ अब सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि राजनीतिक टकराव और चुनावी युद्ध का प्रतीक बन चुकी है, जिसके नतीजे आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति पर गहरा असर डाल सकते हैं।









