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मुंबई, पुणे की अगली मेयर होगी महिला: लॉटरी ने पलटा महाराष्ट्र की सत्ता का गणित, विपक्ष ने उठाए सवाल

मुंबई, पुणे की अगली मेयर होगी महिला

महाराष्ट्र की राजनीति में हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया गया, जिसका सीधा असर देश की सबसे अमीर महानगरपालिका BMC (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) समेत राज्य के चार प्रमुख महानगरों की दिशा पर पड़ेगा। लॉटरी सिस्टम के जरिए यह तय हो गया है कि मुंबई, पुणे, नागपुर और नाशिक नगर निगमों की कमान अब एक महिला मेयर के हाथों में होगी। यह फैसला सिर्फ आरक्षण नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता का गणित बदलने वाली एक बड़ी राजनीतिक रणनीति मानी जा रही है।

हाल ही में बृहन्मुंबई महानगरपालिका सहित महाराष्ट्र की 29 नगर महापालिकाओं में मेयर पद के आरक्षण के लिए लॉटरी खोली गई थी। इन नतीजों ने यह तस्वीर साफ कर दी है कि BMC (मुंबई), पुणे, नागपुर और नाशिक जैसे महत्वपूर्ण नगर निगमों में मेयर पद सामान्य श्रेणी (महिला) के लिए आरक्षित किया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि इन बड़े और प्रभावशाली शहरों का नेतृत्व अब किसी महिला मेयर के हाथों में होगा।

इस फैसले के पीछे गहरे सियासी मायने देखे जा रहे हैं। मुंबई BMC में बीजेपी और शिंदे गुट के पास कुल 118 सीटों का बहुमत है। हालांकि, इस गठबंधन से एक भी SC वर्ग का पार्षद नहीं जीता था। यही कारण था कि अगर मेयर पद SC कैटेगरी में जाता, तो यह उद्धव ठाकरे गुट के लिए सत्ता का रास्ता आसान कर सकता था। लेकिन, लॉटरी सामान्य महिला वर्ग के पक्ष में जाने से यह बाध्यता समाप्त हो गई। अब सामान्य महिला श्रेणी का मतलब साफ है कि किसी भी जाति की बाध्यता नहीं रहेगी। हर पार्टी अपनी सबसे मजबूत और लोकप्रिय महिला पार्षद को मेयर की रेस में उतार सकती है।

देश की सबसे अमीर महानगरपालिका, जिसका बजट कई राज्यों से भी अधिक है, उसकी तस्वीर महिला आरक्षण के बाद बदल चुकी है। हालांकि, इस लॉटरी सिस्टम पर उद्धव ठाकरे गुट ने सवाल उठाए हैं। उद्धव ठाकरे गुट का आरोप है कि आरक्षण और रोटेशन की प्रक्रिया को सत्ताधारी पार्टी के फायदे के हिसाब से मोड़ा गया है, ताकि खास चेहरों के लिए रास्ता साफ किया जा सके। विपक्ष इसे केवल लॉटरी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति बता रहा है।

लॉटरी के बाद अब असली सियासी जंग सदन में शुरू होगी। मेयर का चुनाव जनता नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुने गए पार्षद करेंगे। अब सब कुछ फ्लोर मैनेजमेंट पर टिका है, जहां बहुमत वाला गठबंधन ही इन बड़े शहरों के नेतृत्व का चेहरा तय करेगा।

महिला आरक्षण ने इस चुनावी लड़ाई को और भी अधिक दिलचस्प बना दिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सत्ताधारी गठबंधन किस मजबूत महिला चेहरे पर दांव लगाता है और क्या सदन के भीतर का गणित चेहरे की लोकप्रियता पर भारी पड़ेगा।