राहुल गांधी को हुआ क्या है?आखिर उनके दर्द की दवा क्या है?

राहुल गांधी लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकारों के बीच चर्चा है कि कांग्रेस को संगठन, जनाधार और चुनावी रणनीति को और मजबूत करने की जरूरत है। राहुल गांधी ने हाल के दिनों में युवाओं, बेरोजगारी और छात्रों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है।
राहुल गांधी

भारतीय राजनीति में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा अगर लगातार अपने बयानों और राजनीतिक अंदाज को लेकर सवालों में घिरने लगे, तो सवाल सिर्फ सत्ता पक्ष पर नहीं उठता… सवाल उस नेता की राजनीति पर भी उठता है।

राहुल गांधी आज देश के नेता प्रतिपक्ष हैं। कांग्रेस उन्हें नरेंद्र मोदी के मुकाबले राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर पेश करती है। ऐसे में उनसे अपेक्षा सिर्फ सरकार पर हमला करने की नहीं, बल्कि एक गंभीर और जिम्मेदार विकल्प की राजनीति पेश करने की भी होती है।

लेकिन पिछले कुछ दिनों में राहुल गांधी के बयानों ने एक अलग ही बहस को जन्म दे दिया है। 13 अगस्त के कांग्रेस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए राहुल गांधी ने कहा—“इनको हम पागल कर देंगे।” उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी रात नहीं सोते और अमित शाह के संसद से गायब रहने को लेकर भी तीखी टिप्पणी की।

सवाल है- क्या प्रधानमंत्री की नीतियों पर सवाल उठाने के लिए इस तरह की भाषा जरूरी है?

राहुल गांधी ने विदेश नीति को लेकर प्रधानमंत्री पर तंज कसा और कहा कि उनके लिए विदेश नीति का मतलब नेताओं को गले लगाना है। इसके बाद संदीप दीक्षित के साथ मंच पर हुआ मेलोनी वाला मजाक भी चर्चा में आ गया।
दूसरी तरफ संसद परिसर में “56 इंच का छोटा बंदर” जैसे नारे और मीडिया को “चूहा” कहे जाने वाले बयान ने राजनीतिक संवाद के स्तर पर बहस छेड़ दी।

आखिर राहुल गांधी इतने आक्रामक क्यों हैं?

यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस नेता नहीं हैं। वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और कांग्रेस उन्हें भविष्य के राष्ट्रीय नेतृत्व के विकल्प के तौर पर देखती है।
विपक्ष का काम सरकार को घेरना है। बेरोजगारी, महंगाई, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और दूसरे मुद्दों पर तीखे सवाल पूछना लोकतंत्र की जरूरत है। लेकिन जब मुद्दों की जगह व्यक्तिगत कटाक्ष ज्यादा दिखाई देने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि राहुल गांधी की राजनीति आखिर किस दिशा में जा रही है?

दर्द क्या है… और दवा क्या है?

क्या राहुल गांधी की सबसे बड़ी समस्या नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता है? क्या कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी है? या फिर राहुल गांधी खुद अपनी भाषा और राजनीतिक शैली से अपनी राह मुश्किल कर रहे हैं?

कांग्रेस अगर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का विकल्प बनाना चाहती है, तो उन्हें सिर्फ मोदी विरोध का चेहरा नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक नेतृत्व के तौर पर स्थापित करना होगा।

इसके लिए भाषण में गुस्से से ज्यादा नीति चाहिए… व्यक्तिगत हमलों से ज्यादा मुद्दे चाहिए… और नारों से ज्यादा ठोस राजनीतिक विजन चाहिए।

क्योंकि जनता सिर्फ यह नहीं पूछती कि आप मोदी को कितना घेर सकते हैं… जनता यह भी देखती है कि मोदी के बाद आप क्या देने वाले हैं।

तो सवाल सीधा है—राहुल गांधी को हुआ क्या है? आखिर उनके राजनीतिक दर्द की दवा क्या है?

क्या दवा बीजेपी विरोध में है… संगठन में है… रणनीति में है… या फिर सबसे पहले राहुल गांधी को अपनी ही राजनीतिक भाषा और अंदाज में बदलाव करना होगा?

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