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शंकराचार्य विवाद: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में संत समाज एकजुट, वृंदावन में बड़ा विरोध

वृंदावन में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थन में एकजुट हुए संत समाज की बैठक।

वृंदावन से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां धर्म और अध्यात्म के सर्वोच्च पद, शंकराचार्य पद को लेकर संत समाज एकजुट हो गया है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज को लेकर हाल ही में उठे विवाद के बाद, संत समाज ने एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित कर उनके प्रति अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है और मेला प्रशासन के व्यवहार को अनुचित बताया है।

वृंदावन स्थित राधानंद गिरी महाराज के आश्रम में साधु-संतों की एक महत्वपूर्ण सभा आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के समर्थन में एक स्पष्ट संदेश देना था।

संत समाज ने एक स्वर में कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज को तीनों पीठों के शंकराचार्यों का पूर्ण समर्थन प्राप्त है, ऐसे में मेला प्रशासन द्वारा उनसे प्रमाण या उनकी योग्यता पर सवाल उठाए जाना दुर्भाग्यपूर्ण और पूरी तरह से अनुचित है। संतों का तर्क है कि जब गुरु परंपरा के अनुसार उन्हें शंकराचार्य माना जाता है, तो प्रशासन को इसमें हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।

इस दौरान कई प्रमुख संतों ने अपनी बात रखी:

दिनेश फलाहारी महाराज (श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर–मस्जिद केस के मुख्य याचिकाकर्ता) ने जोर देकर कहा कि शंकराचार्य पीठ भगवान शिव की गद्दी के समान है और वे सनातन धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्गदर्शक होते हैं। उन्होंने शंकराचार्य की तुलना सनातनी हिंदुओं के लिए प्रधानमंत्री से करते हुए मांग की कि प्रशासन को इस गलती के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।

आचार्य मधुसूदन दास महाराज ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील करते हुए कहा कि राज्य के मुखिया होने के नाते उन्हें इस पूरे प्रकरण को समाप्त करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।

आचार्य अनमोल दास महाराज ने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य का चयन और पद गुरु परंपरा से प्राप्त होता है, न कि किसी सरकारी या प्रशासनिक आदेश से।

साध्वी इंदुलेखा जी ने कहा कि जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के लिए पूजनीय हैं, उसी प्रकार शंकराचार्य हिंदुओं के लिए पूज्यनीय हैं और वे सनातन धर्म का गौरव हैं।

संत समाज ने सर्वसम्मति से मेला प्रशासन से तत्काल माफी मांगने और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को सम्मान सहित स्नान (शाही स्नान) की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।

संत समाज की यह एकजुटता दर्शाती है कि धर्म और अध्यात्म के सर्वोच्च पद के सम्मान में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक कोताही या अनुचित व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय के लिए अब सबकी निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं।

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