दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे सोनम वांगचुक के अनशन को आज सुबह दिल्ली पुलिस ने समाप्त कर दिया। पुलिस उन्हें अनशन स्थल से उठाकर सीधे अस्पताल ले गई।
इस कार्रवाई के बाद आंदोलन के आसपास बन रहा राजनीतिक माहौल अचानक बदल गया। कुछ लोगों का मानना है कि विपक्षी दल इस आंदोलन को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाना चाहते थे, लेकिन पुलिस की त्वरित कार्रवाई से उन्हें वह अवसर नहीं मिला।
एक व्यक्ति ने स्वयं अनशन जारी रखने की घोषणा भी की, लेकिन फिलहाल आंदोलन की दिशा बदलती हुई दिखाई दे रही है।
कई लोगों ने इस घटनाक्रम की तुलना 2011 के अन्ना हज़ारे आंदोलन से की है। उस समय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से कई नए राजनीतिक चेहरे उभरे थे। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि सोनम वांगचुक का आंदोलन भी उसी दिशा में जाता।
आख़िरकार, यह स्पष्ट है कि सामाजिक आंदोलनों और राजनीति के बीच की दूरी अक्सर बहुत कम रह जाती है। ऐसे आंदोलनों का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वे अपने मूल मुद्दों पर केंद्रित रहते हैं या राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं.