बांग्लादेश में तारिक रहमान की वापसी: भारत के लिए दोस्ती का पैगाम या नई चुनौती?

बांग्लादेश में तारिक रहमान की वापसी
बांग्लादेश में तारिक रहमान की वापसी

15 साल तक सत्ता पर काबिज रहीं शेख हसीना के पतन के बाद, बांग्लादेश एक नए राजनीतिक अध्याय की दहलीज पर खड़ा है। हालिया चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने एकतरफा जीत हासिल की है और BNP प्रमुख तारिक रहमान देश की कमान संभालने को तैयार हैं। लेकिन इस सत्ता परिवर्तन से भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है—भारत में शरण ले चुकीं शेख हसीना का प्रत्यर्पण, जिस पर दिल्ली और ढाका के बीच तनाव गहरा गया है।

एक समय ‘मिस्टर 10 परसेंट’ कहकर आलोचना झेलने वाले तारिक रहमान अब बांग्लादेश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे हैं। अवामी लीग के चुनाव से बाहर रहने के बाद BNP ने यह जीत हासिल की है। सत्ता संभालते ही तारिक रहमान ने बदले की राजनीति की जगह राष्ट्रीय सुलह और भ्रष्टाचार मिटाने की बात कहकर नरम रुख अपनाया है। हालांकि, सबसे बड़ा संकट शेख हसीना के इर्द-गिर्द है।

शेख हसीना को जुलाई 2024 के नरसंहार के आरोप में बांग्लादेशी कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है और ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है, ताकि उन्हें सजा दी जा सके। वहीं भारत ने इस मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि: ‘ये आरोप राजनीतिक हैं, आपराधिक नहीं। हम अपने शरणार्थी को मौत के मुंह में नहीं धकेल सकते।’ इस पर BNP प्रमुख तारिक रहमान ने फिलहाल इसे ‘कानूनी प्रक्रिया’ कहकर सीधे टकराव से बचने की कोशिश की है, लेकिन जानकारों का मानना है कि उन्हें अपनी जनता को संतुष्ट करने के लिए प्रत्यर्पण की मांग को जीवित रखना होगा।

तारिक रहमान सरकार को भारत के साथ संबंधों को साधने के लिए कई मोर्चों पर ‘बैलेंसिंग एक्ट’ करना पड़ रहा है। भारत को सबसे बड़ी सुरक्षा चिंता यह है कि BNP के सत्ता में आने से पूर्वोत्तर के विद्रोही समूहों को बांग्लादेश में फिर से पनाह मिल सकती है। इस पर BNP नेता सलाहुद्दीन अहमद ने भारत को आश्वस्त करने के संकेत दिए हैं। दूसरी ओर, तारिक रहमान चीन के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को बढ़ाने की कोशिश करेंगे, जो भारत के लिए चिंता का विषय है। साथ ही, शेख हसीना के दौर में लगभग खत्म हो चुके पाकिस्तान के साथ भी तारिक ‘सामान्य रिश्ते’ चाहते हैं, जो दक्षिण एशिया के भू-राजनीति को बदल सकता है।

तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती कट्टरपंथी ताकतों को रोकना है। इतिहास गवाह है कि जब-जब BNP सत्ता में आई है, भारत के साथ रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। अगर जमात जैसे कट्टरपंथी सहयोगियों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो तारिक के ‘इंसानियत और सुरक्षा’ के वादे झूठे साबित होंगे और भारत के साथ संबंध सुधरने से पहले ही बिगड़ सकते हैं।

2026 में तारिक रहमान खुद को एक मैच्योर लीडर के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के लिए यह ‘देखो और प्रतीक्षा करो’ (वेट एंड वॉच) की स्थिति है। दिल्ली को शेख हसीना की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए ढाका के साथ नए संबंध बनाने की चुनौतीपूर्ण कूटनीतिक परीक्षा से गुजरना होगा।

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