टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग के ताजा मामले ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है, जो मुंबई पुलिस के लिए लंबे समय से चुनौती बना हुआ है. आखिर ये शूटर मिलते कहां हैं? उनका चयन कैसे किया जाता है और मुंबई में गोली चलाने वाले लोग कौन होते हैं? 18 अक्टूबर 2026 की शाम जुहू में एक फुटबॉल क्लब के बाहर टाइगर श्रॉफ की कार पर फायरिंग की घटना सामने आई. इस मामले में कोटा पुलिस ने ट्रेन से तीन आरोपियों को पकड़ा, जिनमें दो हरियाणा और एक बिहार का बताया गया है.
इन सवालों का जवाब किसी एक मामले में नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सामने आई कई चार्जशीट, पुलिस जांच और मीडिया रिपोर्टों में मिलता है. आइए, इसे तरीके से समझते हैं.
शूटर कहाँ से मिलते हैं?
शूटरों की भर्ती के लिए सोशल मीडिया को एक अहम माध्यम माना जाता है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में मुंबई क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के हवाले से बताया गया था कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े कथित फैन अकाउंट इंस्टाग्राम और फेसबुक पर गैंग के सदस्यों की ‘स्वैग’ वाली रील्स अपलोड करते हैं. कुछ पोस्ट में कोर्ट परिसर से जुड़ी तस्वीरें भी दिखाई जाती हैं. अक्टूबर 2023 में पंजाब पुलिस ने गृह मंत्रालय और विभिन्न राज्यों को ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी दी थी. रिपोर्टों के मुताबिक, 6,000 से ज्यादा अकाउंट ब्लॉक किए गए थे. हालांकि, पुराने अकाउंट बंद होने के बाद नए अकाउंट बन जाने से इस नेटवर्क पर लगाम लगाना चुनौती बना रहता है.
क्राइम ब्रांच से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ युवा खुद ऐसे अकाउंट्स को डायरेक्ट मैसेज यानी DM करके गैंग के लिए काम करने की इच्छा जताते हैं. मध्य प्रदेश में गैंग के कथित स्थानीय संपर्कों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिए ऐसे युवाओं को तलाशने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई है, जो पहले से अपराध की ओर झुके हुए थे या व्यवस्था से नाराज थे. आरोप है कि उन्हें ‘इंसाफ दिलाने’ जैसे नैरेटिव के जरिए अपने साथ जोड़ने की कोशिश की जाती थी.
सोशल मीडिया के अलावा जेलों के भीतर मौजूद संपर्कों को भी गैंग के नेटवर्क का पुराना माध्यम माना जाता है. द संडे गार्जियन की एक रिपोर्ट में लॉरेंस बिश्नोई नेटवर्क में 700 से ज्यादा शूटर होने का दावा किया गया था. रिपोर्ट के अनुसार, इनमें करीब 70 प्रतिशत पंजाब और हरियाणा से थे, जबकि बाकी राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मुंबई और दिल्ली समेत अन्य क्षेत्रों से जुड़े बताए गए.
द गार्जियन की रिपोर्ट में भी पंजाब और हरियाणा की जेलों में बंद गैंग के सदस्यों के जरिए नए लोगों को नेटवर्क से जोड़ने की बात कही गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ लोग छोटे अपराधों के मामलों में जेल जाने के दौरान ऐसे संपर्कों में आते हैं और रिहा होने के बाद कथित तौर पर उन्हें टारगेट, पैसे और हथियारों से जुड़ी जिम्मेदारियां दी जाती हैं.
पैसा, जरूरत और ‘मिशन’
शूटरों को कथित तौर पर अपने साथ जोड़ने में आर्थिक लालच एक अहम भूमिका निभाता है. बाबा सिद्दीकी हत्याकांड की चार्जशीट से जुड़ी रिपोर्टों में मुख्य शूटर शिवकुमार गौतम ने बताया था कि शुभम लोनकर ने उसे और उसके साथी धर्मराज कश्यप को 10 से 15 लाख रुपये देने का लालच दिया था और उन्हें यह भी बताया गया था कि सिद्दीकी का दाऊद इब्राहिम से संबंध है और वह बम धमाकों में शामिल रहा है. शिवकुमार गौतम उत्तर प्रदेश का रहने वाला था और कबाड़ के काम से जुड़ा था. जांच से संबंधित रिपोर्टों में उसे आर्थिक रूप से कमजोर बताया गया. आरोप है कि बड़े पैसे का लालच देकर उसे वारदात के लिए तैयार किया गया.
मिड-डे की रिपोर्ट के मुताबिक, अनमोल बिश्नोई ने कथित तौर पर शूटरों से फोन पर बात की थी और उन्हें ‘देशभक्ति’ से जुड़ा नैरेटिव देकर समझाने की कोशिश की थी. रिपोर्ट में दावा किया गया कि सिद्दीकी को दाऊद इब्राहिम से जुड़ा बताकर आरोपियों को वारदात के लिए प्रेरित किया गया. यानी ऐसे मामलों में भर्ती का आधार केवल पैसा ही नहीं, बल्कि किसी कथित मकसद या नैरेटिव का इस्तेमाल भी हो सकता है. इसी तरह, सलमान खान के घर के बाहर हुई फायरिंग के मामले में भी पुलिस जांच और चार्जशीट से जुड़ी रिपोर्टों में सामने आया था कि शूटरों को शुरुआत में गोली चलाने को लेकर झिझक थी. आरोप है कि अनमोल बिश्नोई ने उन्हें इसके लिए तैयार किया और काम के बदले करीब तीन लाख रुपये दिए गए.
नवी मुंबई पुलिस की चार्जशीट से जुड़ी रिपोर्टों में सलमान खान को निशाना बनाने के लिए 25 लाख रुपये की कथित सुपारी का भी उल्लेख किया गया था, जांच में यह दावा भी सामने आया कि इस काम के लिए 18 साल से कम उम्र के लड़कों को भर्ती करने की कोशिश की जा रही थी.
मुंबई में शूटर कौन बनते हैं?
मुंबई में सामने आए कई चर्चित मामलों में दूसरे राज्यों से जुड़े आरोपियों के नाम सामने आए हैं. रोहित शेट्टी से जुड़े फायरिंग मामले में भी शूटर दीपक शर्मा के आगरा से होने और अन्य संदिग्धों के उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा से जुड़े होने की रिपोर्टें सामने आई थीं. लॉरेंस बिश्नोई गैंग के संबंध में भी जांच और मीडिया रिपोर्टों में उत्तर प्रदेश समेत दूसरे राज्यों से लोगों को भर्ती करने और मुंबई में वारदातों को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है. इसकी एक वजह अलग-अलग राज्यों में फैले संपर्क और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध लोग हो सकते हैं.
दूसरी श्रेणी में स्थानीय स्तर पर मदद करने वाले सहयोगी आते हैं, इनकी भूमिका वाहन उपलब्ध कराने, रेकी करने या हथियारों की आवाजाही में मदद करने जैसी हो सकती है, रोहित शेट्टी से जुड़े मामले की रिपोर्टों में पुणे और उत्तर प्रदेश से जुड़े कथित मॉड्यूल की अलग-अलग भूमिकाओं का जिक्र किया गया था.
पुणे मॉड्यूल ने वाहन और हथियारों से जुड़ी व्यवस्था संभाली, जबकि उत्तर प्रदेश से जुड़े मॉड्यूल पर फायरिंग की जिम्मेदारी होने का आरोप लगाया गया. इसी मामले में पुणे मॉड्यूल को 60 हजार रुपये और उत्तर प्रदेश मॉड्यूल के सात लोगों को एक लाख रुपये दिए जाने का दावा भी रिपोर्टों में किया गया था. इनसे यह संकेत मिलता है कि आपराधिक नेटवर्क में अलग-अलग लोगों को उनकी भूमिका के हिसाब से जिम्मेदारी और भुगतान दिया जाता है.
नतीजा: पुराना अंडरवर्ल्ड बदल चुका है
1990 के दशक में अंडरवर्ल्ड के शूटर एक गैंग के मेंबर बन कर रहते थे जिसके कारण जांच एजेंसी को उनकी पहचान करना आसान होता था, क्योंकि एक गैंग से जुड़ने के बाद वो काफी समय के लिए उस गैंग के लिए काम करते थे, लेकिन आज हालत कुछ और है, अब कई मामलों में जांच एजेंसियों को ऐसे कथित मॉड्यूल देखने को मिलते हैं, जिनमें अलग-अलग लोग किसी एक वारदात के लिए सीमित भूमिका निभाते हैं. वारदात के बाद उनके संपर्क टूट सकते हैं या वे दूसरे स्थानों पर चले जाते हैं.
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अदालत में लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े नेटवर्क के संबंध में जेल में रहते हुए भी सिंडिकेट चलाने के आरोप रखे हैं. वहीं, मुंबई पुलिस संगठित अपराध से जुड़े मामलों में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम यानी मकोका (MCOCA) के तहत कार्रवाई कर सकती है, यदि मामले में कानून की निर्धारित शर्तें पूरी होती हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब हर वारदात में नए चेहरे सामने आते हों, आरोपी अलग-अलग राज्यों से जुड़े हों और सोशल मीडिया के जरिए संपर्क बनाए जाने के आरोप हों, तो क्या केवल गिरफ्तारी से इस नेटवर्क को रोका जा सकता है?
बाबा सिद्दीकी हत्याकांड, सलमान खान के घर के बाहर हुई फायरिंग और रोहित शेट्टी से जुड़े मामले इस चुनौती की ओर ध्यान दिलाते हैं. ऐसे मामलों में सिर्फ फायरिंग करने वाले आरोपियों तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं होता. साजिश के पीछे मौजूद लोगों, पैसों के लेन-देन, हथियारों की आपूर्ति और अलग-अलग राज्यों में फैले संपर्कों की जांच भी जरूरी होती है.
मुंबई की सुरक्षा के लिहाज से यह सवाल अब सिर्फ क्राइम ब्रांच की फाइल तक सीमित नहीं है. असली चुनौती उस पूरे नेटवर्क की पहचान करना है, जो कथित तौर पर युवाओं को अपने साथ जोड़ता है, उन्हें वारदात के लिए तैयार करता है और घटना के बाद उन्हें अलग-अलग दिशाओं में भेज देता है.