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वंदे मातरम:1937 की कांग्रेस कार्यसमिति ने क्या कहा था? जानिए प्रस्ताव क्या हुआ था, जाने पूरा इतिहास।

1937 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में 'वंदे मातरम' गीत के उपयोग को लेकर एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया था।
वंदे मातरम विवाद: 1937 की कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में क्या कहा गया?

Vande Mataram Controversy: राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को लेकर देश में जारी सियासी विवाद के बीच कांग्रेस के 1937 के उस प्रस्ताव की चर्चा फिर तेज हो गई है, जिसमें राष्ट्रीय समारोहों में गीत के केवल शुरुआती दो हिस्से गाने की सिफारिश की गई थी। कांग्रेस अपने मौजूदा रुख को इसी ऐतिहासिक प्रस्ताव से जोड़ रही है, जबकि बीजेपी का आरोप है कि पार्टी राष्ट्रगीत का अपमान कर रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम को लेकर क्या कहा था और सिर्फ शुरुआती दो हिस्सों को गाने की सिफारिश क्यों की गई थी।

वंदे मातरम को लेकर 1937 में क्यों हुई थी चर्चा?

कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने प्रस्ताव में वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ में शामिल है, लेकिन उनके जीवन से जुड़ी जानकारी के अनुसार इसे उपन्यास से पहले लिखा गया था। इसलिए गीत को उपन्यास से अलग भी देखा जाना चाहिए।

प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया कि 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम को संगीत दिया था। ब्रिटिश शासन के दौरान ‘वंदे मातरम’ शब्दों और इस गीत को लेकर दमन की कार्रवाई का भी जिक्र किया गया।

स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया था गीत

कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव में कहा गया कि पिछले कई दशकों में वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान लोगों ने इस गीत और इसके नारों के साथ गिरफ्तारियां झेलीं, लाठियां खाईं और बलिदान दिए।

प्रस्ताव के मुताबिक, ‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक गीत नहीं रहा, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीयों के विरोध और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बन गया। इसके शब्द लोगों के लिए प्रेरणा और राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान एक तरह का अभिवादन बन गए थे।

पहले दो हिस्से क्यों चुने गए?

कार्यसमिति ने कहा था कि समय के साथ गीत के पहले दो हिस्सों का इस्तेमाल पूरे देश में व्यापक रूप से होने लगा, जबकि बाकी हिस्से बहुत कम लोगों के बीच प्रचलित थे।

प्रस्ताव में शुरुआती दो हिस्सों को मातृभूमि की सुंदरता और उसकी समृद्धि का वर्णन करने वाला बताया गया। कांग्रेस कार्यसमिति के अनुसार, इन हिस्सों में ऐसी कोई बात नहीं थी जिस पर धार्मिक या किसी अन्य आधार पर आपत्ति की जा सके।

वहीं प्रस्ताव में कहा गया कि गीत के बाद के हिस्सों में कुछ धार्मिक संकेत और विचार मौजूद हैं, जो भारत के अलग-अलग धार्मिक समुदायों की मान्यताओं से मेल नहीं खा सकते हैं।

मुस्लिम समुदाय की आपत्तियों का भी जिक्र

1937 के प्रस्ताव में कांग्रेस कार्यसमिति ने स्पष्ट रूप से कहा था कि गीत के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम समुदाय के नेताओं की आपत्तियों को उसने ध्यान में रखा है।

कमेटी का मानना था कि राष्ट्रीय आंदोलन में वंदे मातरम की भूमिका और उसके शुरुआती दो हिस्सों की व्यापक स्वीकार्यता को देखते हुए इन्हीं हिस्सों को राष्ट्रीय समारोहों में गाना उचित होगा।

राष्ट्रीय समारोहों में सिर्फ दो हिस्से गाने की सिफारिश

कार्यसमिति ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सिफारिश की कि राष्ट्रीय समारोहों में वंदे मातरम गाते समय केवल पहले दो हिस्से ही गाए जाएं।

साथ ही आयोजकों को यह स्वतंत्रता देने की बात कही गई थी कि वे वंदे मातरम के अलावा या उसकी जगह कोई ऐसा गीत भी चुन सकते हैं, जिस पर किसी समुदाय या वर्ग को आपत्ति न हो।

यानी 1937 के प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य वंदे मातरम के राष्ट्रीय महत्व को स्वीकार करने के साथ-साथ ऐसे हिस्सों को लेकर सहमति बनाना था, जिन पर किसी समुदाय की धार्मिक आपत्ति न हो।

क्या कांग्रेस ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय गान घोषित किया था?

प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि कांग्रेस ने वंदे मातरम को आधिकारिक तौर पर भारत के राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार नहीं किया था। हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसके व्यापक इस्तेमाल ने इसे विशेष राष्ट्रीय महत्व जरूर दिलाया।

कार्यसमिति ने माना कि आंदोलन के दौरान लोगों के बलिदान और लोकप्रिय इस्तेमाल ने वंदे मातरम के शुरुआती दो हिस्सों को राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बना दिया था। इसलिए इन हिस्सों को सम्मान दिए जाने की बात कही गई।

राष्ट्रीय गीतों का संग्रह तैयार करने की भी पहल

1937 के प्रस्ताव में कांग्रेस कार्यसमिति ने अन्य राष्ट्रीय गीतों को लेकर भी एक पहल की थी। इसके लिए एक सब-कमेटी गठित करने का फैसला किया गया था।

इस कमेटी में मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और नरेंद्र देव को शामिल किया गया था। कमेटी का उद्देश्य ऐसे राष्ट्रीय गीतों की समीक्षा करना था, जिन्हें भविष्य में राष्ट्रीय कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जा सके।

प्रस्ताव के अनुसार, गीतों को सरल हिंदुस्तानी भाषा में होने और उनकी धुन में उत्साह व प्रेरणा पैदा करने जैसे मानकों पर भी परखा जाना था। इसके लिए रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह लेने की बात भी कही गई थी।

आज फिर क्यों चर्चा में है 1937 का प्रस्ताव?

आज वंदे मातरम को लेकर जारी विवाद में कांग्रेस इसी ऐतिहासिक प्रस्ताव का हवाला दे रही है। पार्टी का कहना है कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने विचार-विमर्श के बाद शुरुआती दो हिस्सों को राष्ट्रीय समारोहों के लिए उपयुक्त माना था।

दूसरी ओर, बीजेपी का आरोप है कि मौजूदा समय में वंदे मातरम के पूरे संस्करण को लेकर कांग्रेस का रुख राष्ट्रगीत के सम्मान से जुड़ा मुद्दा है।

इस तरह करीब 89 साल पुराने कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव ने एक बार फिर देश की राजनीति में जगह बना ली है। विवाद का केंद्र यही सवाल है कि राष्ट्रीय समारोहों में वंदे मातरम के कितने हिस्से गाए जाने चाहिए और 1937 में लिया गया फैसला आज के राजनीतिक और संवैधानिक संदर्भ में किस तरह देखा जाए।

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