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हिंदू राष्ट्र की मांग तेज़: दिनेश फलाहारी महाराज ने मोहन भागवत को खून से लिखा पत्र, संतों का मिला समर्थन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघ चालक मोहन भागवत के ब्रजभूमि वृंदावन प्रवास के बीच भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ घोषित करने की मांग ने एक बार फिर ज़ोर पकड़ लिया है। इस मांग को लेकर श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह मामले के मुख्य हिंदू पक्षकार दिनेश फलाहारी महाराज ने एक बड़ा और प्रतीकात्मक कदम उठाया है, जिसने पूरे धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

दिनेश फलाहारी महाराज ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को अपने खून से एक पत्र लिखकर भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग की है। उन्होंने पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया है कि 125 करोड़ हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अब इस दिशा में ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है। उन्होंने अपनी मांग के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि भारत सनातनी हिंदुओं का एकमात्र देश है और इसे हिंदू राष्ट्र बनाना हिंदू समाज की व्यापक इच्छा है।

फलाहारी महाराज के मुख्य तर्क:

– फलाहारी महाराज ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि जिन देशों में एक विशेष समुदाय की आबादी तेज़ी से बढ़ी है, वहां अक्सर अस्थिरता, हिंसा और लोकतांत्रिक मूल्यों के कमजोर होने की स्थिति देखी गई है।

– उन्होंने आशंका जताई कि यदि समय रहते निर्णय नहीं लिया गया, तो भविष्य में भारत की सामाजिक संरचना पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

– उनके अनुसार, हिंदू राष्ट्र घोषित होने से जनसंख्या नियंत्रण कानून, गौ-हत्या निषेध और मठ-मंदिरों के संरक्षण जैसे विषयों पर प्रभावी अमल संभव हो सकेगा।

इस मामले में ब्रजभूमि के कई प्रमुख संतों ने दिनेश फलाहारी महाराज (फलारी बाबा) के इस पत्र का समर्थन किया है। समर्थन देने वालों में “महामंडलेश्वर रामदास जी महाराज”, “महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णानंद जी महाराज”, कुंज बिहारी पीठाधीश्वर इंदुलेखा, मधुसूदन दास महाराज, अतुल कृष्ण दास जी महाराज, और अनमोल दास जी महाराज सहित अन्य संत शामिल हैं। संतों का कहना है कि यह मांग सीधे हिंदू समाज की भावनाओं से जुड़ी है और इस पर तत्काल गंभीर विचार होना चाहिए।

फिलहाल, संघ प्रमुख मोहन भागवत के प्रवास के दौरान उठे इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर सरकार या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन वृंदावन में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है और पूरे देश की निगाहें इस पर टिकी हैं।

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