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विपक्ष को ले डूबेगी ‘एंटी-हिंदू’ राजनीति! हिंदू आस्था की अनदेखी कर क्या विपक्ष 2027 की लड़ाई जीत सकता है?

जंतर-मंतर आंदोलन और राम मंदिर जैसे सांस्कृतिक मुद्दों ने बीजेपी को चुनावी राजनीति में विपक्ष पर बढ़त दिलाई।
प्रेम शंकर सिंह मैनेजिंग एडिटर
प्रेम शंकर सिंह , मैनेजिंग एडिटर - भारत अपडेट

भारतीय राजनीति में चुनाव केवल विकास, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर नहीं लड़े जाते। देश की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और राष्ट्रवाद भी चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी ने इन विषयों को लगातार अपने राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा है। इसके विपरीत विपक्ष कई बार ऐसे विवादों में घिरा दिखाई देता है, जिनका संबंध हिंदू आस्था और सनातन परंपराओं से जुड़ जाता है। यही कारण है कि बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या भारत जैसे देश में हिंदू समाज की भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर कोई राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच सकता है?

ताजा उदाहरण जंतर-मंतर का है। आंदोलन का घोषित उद्देश्य NEET और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाना था। लेकिन मंच से स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा भगवान श्रीराम और माता सीता को लेकर की गई टिप्पणी ने पूरे आंदोलन का केंद्र बदल दिया। इसके बाद शिक्षा का मुद्दा पीछे चला गया और चर्चा सनातन आस्था के सम्मान और धार्मिक भावनाओं पर आ गई।
विवाद यहीं तक सीमित नहीं रहा। इस आंदोलन के समर्थन में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव सहित कई विपक्षी नेता जंतर-मंतर पहुंचे। यह जरूरी नहीं कि इन नेताओं ने मंच से हुई हर टिप्पणी का समर्थन किया हो, लेकिन राजनीति में तस्वीरें और संदेश भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने बयान। आम मतदाता अक्सर यह देखता है कि कौन किस मंच पर खड़ा है। यही धारणा चुनावी राजनीति में बड़ा असर डालती है।

राम मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा को बीजेपी ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। दूसरी ओर कई विपक्षी नेताओं का समारोह से दूरी बनाना भी जनता के बीच चर्चा का विषय बना। बीजेपी ने इसे यह संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया कि वह राम और सनातन की राजनीति के साथ खड़ी है।

इसी तरह अनुच्छेद 370 हटाने, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, समान नागरिक संहिता, पाकिस्तान पर सख्त नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी बीजेपी ने स्पष्ट रुख अपनाया। विपक्ष कई बार इन विषयों पर या तो बंटा हुआ दिखाई दिया या फिर रक्षात्मक मुद्रा में रहा। इसका राजनीतिक लाभ बीजेपी को मिलता रहा।

यही वजह है कि विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बीजेपी का चुनावी संगठन नहीं, बल्कि जनता के बीच अपनी राजनीतिक छवि भी है। यदि किसी आंदोलन में हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी होती है और विपक्ष के बड़े चेहरे उसी मंच पर दिखाई देते हैं, तो उसके विरोधियों को यह कहने का अवसर मिल जाता है कि विपक्ष हिंदू आस्था के सवालों पर संवेदनशील नहीं है। सही या गलत, ऐसी धारणा चुनावी राजनीति में असर छोड़ती है।

अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी शुरू हो चुकी है। यह राज्य केवल जातीय समीकरणों से नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों से भी प्रभावित होता है। ऐसे में यदि विपक्ष बार-बार ऐसे विवादों में घिरता है, जिनका संबंध सनातन आस्था से जुड़ जाता है, तो बीजेपी को राजनीतिक बढ़त मिल सकती है। दूसरी ओर यदि विपक्ष स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि वह जनआंदोलनों का समर्थन करता है लेकिन किसी भी धर्म, देवी-देवता या आस्था के अपमान का समर्थन नहीं करता, तो वह अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जनता केवल घोषणापत्र नहीं देखती, बल्कि यह भी देखती है कि कठिन मुद्दों पर कौन किसके साथ खड़ा दिखाई देता है। यही संदेश चुनावी राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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