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आरक्षण हटाओ आंदोलन और महिला रिजर्वेशन पर सियासी लड़ाई, क्या है पूरा विवाद? जानिए वजह और मुख्य बातें।

आरक्षण व्यवस्था और महिला आरक्षण को लेकर देश में सियासी बहस तेज हो गई है। एक तरफ जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा की मांग उठ रही है, तो दूसरी ओर महिला आरक्षण लागू करने को लेकर BJP और विपक्ष आमने-सामने हैं।
आरक्षण विरोध और महिला रिजर्वेशन पर सियासी संग्राम

आरक्षण के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों और महिला आरक्षण को लेकर सियासत तेज हो गई है। सोशल मीडिया के साथ-साथ दिल्ली, लखनऊ, पटना और जयपुर समेत देश के कई शहरों में जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। वहीं, महिला आरक्षण को लेकर बीजेपी विपक्षी कांग्रेस को घेर रही है। कांग्रेस का सवाल है कि बीजेपी महिला आरक्षण को लागू क्यों नहीं कर रही और इसे जनगणना व परिसीमन से क्यों जोड़ा जा रहा है?

जाति आधारित आरक्षण के विरोध और आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर सेंट्रल दिल्ली में रविवार को भी करीब 300 लोग जमा हुए और प्रदर्शन किया। इसके बाद पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि सरकारी मदद आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक पहुंचनी चाहिए। साथ ही उन्होंने ‘क्रीमी लेयर’ का नियम लागू करने और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग की।

क्या है प्रदर्शनकारियों की मांग?

न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हम आरक्षण में सुधार चाहते हैं। सरकार को यह समझना चाहिए कि सभी समुदायों के गरीब लोगों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उनकी चिंताओं को सुना जाना चाहिए।”

एक अन्य प्रदर्शनकारी ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आरक्षण का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचे, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

आरक्षण सुधार को लेकर हो रहे प्रदर्शन के लिए सोशल मीडिया पर भी कई हैंडल बनाए गए हैं। ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 56 लाख से अधिक फॉलोअर्स बताए जा रहे हैं। आंदोलन में शामिल यूट्यूबर अजीत भारती का कहना है कि EWS वर्ग को भी वह सभी आर्थिक सुविधाएं दी जानी चाहिए, जो SC वर्ग को मिलती हैं। इनमें मुफ्त कोचिंग, मुफ्त फॉर्म, शून्य हॉस्टल और कोर्स फीस जैसी सुविधाएं शामिल हैं। उनका यह भी कहना है कि अगर लोन लेना पड़े तो उसमें भी रियायत दी जानी चाहिए।

अजीत भारती ने ‘कोटा विदिन कोटा’ लागू करने की मांग भी उठाई। उनका कहना है कि इससे SC और OBC वर्ग में उन जातियों तक आरक्षण का लाभ पहुंच सकेगा, जिन्हें अब तक अपेक्षाकृत कम लाभ मिला है। उन्होंने एक व्यक्ति और एक परिवार को एक बार आरक्षण देने की बात भी कही।

दलित नेताओं ने बढ़ाई सियासी टेंशन

इन मांगों पर सरकार की ओर से फिलहाल कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सरकार में शामिल दलित नेताओं ने आरक्षण हटाओ आंदोलन का विरोध किया है। केंद्रीय मंत्री और एलजेपी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान तथा आरपीआई के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने प्रदर्शन पर कड़ा रुख अपनाया है।

चिराग पासवान ने कहा कि आरक्षण किसी को दी गई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा, “जब तक चिराग पासवान जिंदा है, तब तक न संविधान को कोई खतरा है और न आरक्षण को कोई खतरा है।”

वहीं, रामदास अठावले ने आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

आरक्षण को लेकर यह सियासी हंगामा ऐसे समय में तेज हुआ है, जब उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। विपक्षी दल पहले से ही आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी पर हमलावर हैं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव नियुक्तियों, खासकर विश्वविद्यालयों में आरक्षित सीटों को नहीं भरे जाने का आरोप लगाते रहे हैं।

अखिलेश यादव ने कहा कि ‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर ‘आरक्षण समाप्ति’ का षड्यंत्र PDA समाज के खिलाफ एक और गहरी साजिश है। उन्होंने कहा कि बीजेपी और उसके सहयोगी समय-समय पर ‘समीक्षा’, ‘सुधार’ और ‘क्रीमी लेयर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर आरक्षण को लेकर भ्रम पैदा करते हैं। अखिलेश ने कहा, “आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा।”

बसपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी आरक्षण विरोधी प्रदर्शन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर संविधान में SC, ST और OBC समाज को दिए गए आरक्षण के खिलाफ आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग उचित नहीं है।

बीजेपी पर भी लगे गंभीर आरोप

प्रकाश आंबेडकर ने दिल्ली में हो रहे आरक्षण विरोधी प्रदर्शन को लेकर बीजेपी और आरएसएस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन सामाजिक न्याय के खिलाफ वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश है। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी पर भी सवाल उठाए।

वहीं, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि लंबे समय से संविधान प्रदत्त हिस्सेदारी यानी आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अब इसी मुहिम को ‘आरक्षण में सुधार’ जैसे शब्दों की आड़ में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने साफ कहा कि आरक्षण व्यवस्था में किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

ब्रजेश पाठक की मुलाकात से बढ़ी चर्चा

यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई, जब यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आरक्षण हटाओ आंदोलन में शामिल रहे हर्ष दुबे, मृत्युंजय पाठक और शिवा शर्मा से मुलाकात की। पाठक ने कहा कि छात्रों की मांगों को गंभीरता से सुना गया है और अगले दो दिनों में छात्रों के प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात केंद्रीय मंत्री से कराई जाएगी।

उन्होंने कहा कि छात्रों की मांग है कि देश के हर छात्र को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले।

वहीं, आरक्षण को लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में Gen Z से संवाद के दौरान कहा था कि जब तक सामाजिक असमानता मौजूद है, तब तक आरक्षण रहेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि आरक्षण के मुद्दे को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए।

महिला आरक्षण पर भी सियासी घमासान

आरक्षण को लेकर चल रहे विवाद के बीच महिला आरक्षण पर भी बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। बीजेपी नेता स्मृति ईरानी ने रविवार को कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने महिलाओं के लिए संसद में 33% आरक्षण का कानून पास किया है।

उन्होंने कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष से इस पहल का समर्थन करने और महिला आरक्षण कानून को जल्द लागू करने की मांग की।

इसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा ने 20 सितंबर 2023 और राज्यसभा ने 21 सितंबर 2023 को पारित किया था। 28 सितंबर को राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी। कांग्रेस ने कहा कि उसने इस कानून का समर्थन किया था, लेकिन बीजेपी सरकार ने अब तक इसे लागू नहीं किया।

कांग्रेस का सवाल है कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया? विपक्षी दलों की मांग है कि परिसीमन से अलग रखते हुए महिला आरक्षण को लागू किया जाए।

परिसीमन को लेकर भी उठ रहे सवाल

मौजूदा महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया अहम मानी जा रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इसी वजह से महिला आरक्षण के लागू होने में देरी हो रही है।

वहीं, परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों में भी चिंता जताई जा रही है। आशंका है कि सीटों के पुनर्निर्धारण से राज्यों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार कई मौकों पर इन आशंकाओं को खारिज कर चुकी है।

अब ऐसी अटकलें हैं कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर संसद में जल्द कोई बड़ा कदम उठा सकती है। ऐसे में आरक्षण और महिला आरक्षण का मुद्दा आने वाले दिनों में देश की राजनीति में और बड़ा सियासी मुद्दा बन सकता है।

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