नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। इस बार सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब वैश्विक राजनीति कई ध्रुवों में बंटी हुई है। एक ओर रूस और चीन जैसे भारत के महत्वपूर्ण साझेदार हैं, तो दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं।
ऐसे में दिल्ली में होने वाली BRICS बैठक भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत रूस और चीन के साथ अपने रिश्तों को मजबूत रखते हुए पश्चिमी देशों का भरोसा भी कायम रख पाएगा?
रूस के साथ पुरानी दोस्ती, ऊर्जा और रक्षा सबसे बड़ा आधार
भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी का दायरा रक्षा से लेकर ऊर्जा और व्यापार तक फैला हुआ है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने मॉस्को के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं किया।
रूसी कच्चे तेल की खरीद भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हो गई है। पश्चिमी देशों की आपत्तियों के बावजूद भारत का तर्क रहा है कि सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा की उपलब्धता उसकी राष्ट्रीय जरूरत है।
रूस के साथ बढ़ता व्यापार और भुगतान के वैकल्पिक रास्ते भी दोनों देशों के रिश्तों की अहमियत दिखाते हैं। हालांकि, यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की चीन पर बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक निर्भरता भारत के लिए चिंता का विषय है। नई दिल्ली नहीं चाहती कि मॉस्को पूरी तरह बीजिंग के प्रभाव में चला जाए।
चीन के साथ रिश्ते में दोस्ती से ज्यादा चुनौती
रूस के बाद BRICS में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन है। दोनों देश एक तरफ आर्थिक और बहुपक्षीय मंचों पर साथ दिखाई देते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सीमा विवाद ने रिश्तों में गहरा अविश्वास पैदा किया है।
2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव बढ़ गया था। हालांकि, हाल के वर्षों में दोनों देशों ने सीमा पर तनाव कम करने और संवाद बहाल करने की दिशा में कदम उठाए हैं।
भारत BRICS को विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने वाला मंच मानता है। लेकिन वह यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि संगठन किसी एक देश के रणनीतिक प्रभाव का माध्यम न बन जाए।
अमेरिका और पश्चिम से भी भारत के मजबूत रिश्ते
भारत की विदेश नीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बढ़ती साझेदारी है। क्वाड के जरिए भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ रक्षा, समुद्री सुरक्षा और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है।
अमेरिका भारत के लिए महत्वपूर्ण व्यापारिक और निवेश साझेदार है। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ रहा है।
हालांकि, रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों पर फैसला किसी दूसरे देश के दबाव में नहीं होगा।
यही वजह है कि भारत की विदेश नीति को अब पारंपरिक गुटनिरपेक्षता के बजाय ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ यानी बहु-गठबंधन की रणनीति के तौर पर देखा जाता है।
BRICS का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए बड़ा अवसर
BRICS के विस्तार के बाद इस संगठन का वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ा है। भारत के लिए यह मंच केवल रूस और चीन के साथ संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों की प्राथमिकताओं को सामने रखने का भी महत्वपूर्ण अवसर है।
भारत चाहता है कि BRICS का फोकस विकास, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, कृषि और वित्तीय सहयोग जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर रहे। इसके साथ ही नई दिल्ली वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग को भी आगे बढ़ाना चाहती है।
भारत की कोशिश होगी कि BRICS को किसी देश या समूह के खिलाफ खड़े मंच के रूप में पेश न किया जाए।
दिल्ली में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की मुलाकात पर दुनिया की नजर
नई दिल्ली में होने वाले शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
इन तीनों नेताओं की एक साथ मौजूदगी भारत की कूटनीतिक स्थिति को भी दिखाएगी। अमेरिका और यूरोपीय देशों में इस बात पर नजर रहेगी कि भारत BRICS के मंच पर किस तरह का रुख अपनाता है।
वहीं भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह रूस के साथ रणनीतिक और ऊर्जा संबंध, चीन के साथ सीमा पर स्थिरता और अमेरिका-पश्चिम के साथ तकनीक व निवेश साझेदारी—इन तीनों को एक साथ आगे बढ़ाए।
भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता सबसे अहम
दिल्ली BRICS Summit भारत की Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता की बड़ी परीक्षा होगी। भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध आगे बढ़ाना चाहता है।
रूस से ऊर्जा और रक्षा सहयोग, पश्चिम से पूंजी और तकनीक तथा चीन के साथ सीमा पर शांति और स्थिरता—भारत को तीनों की जरूरत है।
इसलिए BRICS सम्मेलन में भारत का सबसे बड़ा संदेश यही हो सकता है कि नई दिल्ली किसी एक खेमे को चुनने के बजाय अपने हितों के अनुसार सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति पर कायम है।
आखिरकार, दिल्ली सम्मेलन की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि BRICS देश कितने बड़े फैसले लेते हैं, बल्कि इससे भी होगी कि भारत इस मंच को पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने से रोकते हुए ग्लोबल साउथ और अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच कितना प्रभावी संतुलन बना पाता है।