सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अब अदालत में पेश किए गए 1911 के बिजली बिल और पुराने जमीन रिकॉर्ड को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ता विकास त्यागी ने मस्जिद की पुरानी होने की दलील के आधार पर पेश किए गए दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है।
1911 के बिजली बिल से शुरू हुआ विवाद
मामले की सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष की ओर से मुतवल्ली शहजाद हुसैन के नाम 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल पेश किया गया। इसी दस्तावेज के आधार पर मस्जिद के 100 साल से अधिक पुराना होने का दावा किया गया।
हालांकि, शिकायतकर्ता विकास त्यागी ने इस बिजली बिल की तारीख और प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक सहारनपुर में बिजली की आपूर्ति दिसंबर 1922 के आसपास शुरू हुई थी और बिजली कनेक्शन करीब 1928 से मिलने लगे थे। ऐसे में 1911 का बिजली बिल जारी होने का दावा सवालों के घेरे में है। उन्होंने यह भी बताया कि 1 जनवरी 1911 रविवार का दिन था। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं हुई है।
1888-89 के रिकॉर्ड से क्या सामने आया?
विवाद के बीच शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में फसली 1296 का एक पुराना उर्दू दस्तावेज और उसका हिंदी अनुवाद भी पेश किया गया। बताया गया कि फसली 1296 का यह रिकॉर्ड लगभग 1888-89 का है।
विकास त्यागी के मुताबिक, इस पुराने राजस्व रिकॉर्ड में संबंधित जमीन ‘सरकार केसरी हिंद’ के नाम दर्ज है। दस्तावेज में कचहरी या कलेक्ट्रेट का भी उल्लेख होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता ने इसी रिकॉर्ड को जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद में अहम बताया है।
जमीन के मालिकाना हक पर भी सवाल
विकास त्यागी का दावा है कि अदालत ने पुराने रिकॉर्ड को स्वीकार करते हुए जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज माना। उनके मुताबिक, इससे मस्जिद पक्ष की ओर से जमीन पर किए जा रहे दावे कमजोर पड़ते हैं।
हालांकि, मामले में अलग-अलग पक्षों की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों और उनके कानूनी प्रभाव को लेकर अंतिम स्थिति अदालत के फैसले और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगी।
बिजली बिल की जांच की मांग
शिकायतकर्ता ने अदालत के सामने कथित तौर पर पेश किए गए 1911 के बिजली बिल की प्रामाणिकता की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर दस्तावेज सही है तो उसके आधार और रिकॉर्ड की पुष्टि होनी चाहिए, जबकि गलत पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिद पक्ष को अदालत का दरवाजा खटखटाने का पूरा अधिकार है, लेकिन अपने दावे के समर्थन में विश्वसनीय और प्रमाणित दस्तावेज पेश करना भी जरूरी है।
विवाद के केंद्र में अब पुराने दस्तावेज
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद में अब सबसे अहम सवाल यही है कि मस्जिद के निर्माण और जमीन के स्वामित्व से जुड़े पुराने दस्तावेज कितने प्रमाणिक हैं। एक ओर 1911 के बिजली बिल को मस्जिद की पुरानियत के प्रमाण के तौर पर पेश किए जाने का दावा है, तो दूसरी ओर 1888-89 के राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन के सरकारी होने की बात कही जा रही है।