दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में दवाइयों की खरीद और सप्लाई को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं. शिकायतकर्ता सुरेंद्र चौधरी ने आरोप लगाया है कि अस्पताल में दवाओं की खरीद प्रक्रिया के दौरान टेंडर की शर्तों, दवाओं की कैटेगरी, डिस्काउंट, बिलिंग और सप्लाई में अनियमितताएं हुईं. इस मामले में सीबीआई से जांच की शिकायत किए जाने की बात सामने आई है.
शिकायतकर्ता के मुताबिक, मामला केवल दवाओं की कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी जांच का विषय है कि अस्पताल ने दवाओं की अलग-अलग कैटेगरी तय करने और सप्लायर को भुगतान करने में निर्धारित नियमों का पालन किया है नहीं.
टेंडर की शर्तों पर सवाल
शिकायत में 2025 के लोकल परचेस टेंडर को लेकर सवाल उठाए गए हैं. दावा किया गया है कि Generic, Branded और DPCO कैटेगरी में करीब 3.74 करोड़ रुपये के टर्नओवर की शर्त रखी गई थी. वहीं तीनों कैटेगरी के लिए अलग-अलग EMD की व्यवस्था की गई और कुल EMD करीब 75.90 लाख रुपये बताई गई. शिकायतकर्ता का आरोप है कि टर्नओवर की शर्त पहले की तुलना में काफी बढ़ा दी गई, जिससे छोटी कंपनियों के लिए टेंडर प्रक्रिया में भाग लेना मुश्किल हो सकता था. अब जांच का एक अहम बिंदु यह है कि ये शर्तें किस आधार पर तय की गईं और क्या इससे किसी खास सप्लायर को फायदा मिला.
एक ही सप्लायर को तीनों कैटेगरी में टेंडर मिलने का दावा
याचिकाकर्ता के मुताबिक Generic, Branded और DPCO—तीनों कैटेगरी में एक ही सप्लायर फर्म को काम मिला.
शिकायत में बताए गए डिस्काउंट के मुताबिक:
- Generic: करीब 83.99%
- DPCO: करीब 60%
- Branded: करीब 52%
यहां सबसे बड़ा सवाल डिस्काउंट की प्रतिशत दर से ज्यादा उस MRP और वास्तविक कीमत का है, जिस पर ये डिस्काउंट दिया गया. जांच में यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित दवाओं की बाजार कीमत क्या थी, अस्पताल ने किस कीमत पर खरीद की और सप्लाई की गई दवा वास्तव में किस कैटेगरी में आती थी.
Generic दवाओं की सप्लाई को लेकर बड़ा दावा
याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि टेंडर में Generic दवाओं की हिस्सेदारी करीब 35% रखी गई थी. लेकिन उपलब्ध कुछ बिलों के आधार पर उनका अनुमान है कि वास्तविक Generic सप्लाई केवल 0.25% से 0.5% या उससे भी कम रही. अगर जांच में यह आंकड़ा सही पाया जाता है तो यह सबसे बड़ा सवाल होगा कि टेंडर में Generic दवाओं की इतनी बड़ी जरूरत दिखाए जाने के बावजूद उनकी वास्तविक सप्लाई इतनी कम क्यों रही.
पैरासिटामॉल इंजेक्शन की कीमत पर सवाल
शिकायत में पैरासिटामॉल IV इंजेक्शन की खरीद को उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है. बाजार में उपलब्ध एक Generic विकल्प की कीमत काफी कम थी, जबकि अस्पताल को सप्लाई किए गए दूसरे उत्पाद की MRP करीब 755 रुपये बताई गई और उसे करीब 298 रुपये की दर से खरीदे जाने का दावा किया गया.
शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि जब कम कीमत वाले विकल्प उपलब्ध थे तो अस्पताल ने महंगे विकल्प की खरीद क्यों की. केवल MRP और बाजार कीमत की तुलना से खरीद में अनियमितता साबित नहीं होती. इसके लिए दवा की कंपनी, formulation, strength, tender category, contractual rate और खरीद नियमों का मिलान जरूरी होगा.
1000 mg और 1500 mg की दवा को लेकर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने पैरासिटामॉल IV इंजेक्शन की strength को लेकर भी सवाल उठाया है. उनका दावा है कि संबंधित DPCO कैटेगरी में 1500 mg की दवा निर्धारित थी, जबकि अस्पताल को कथित तौर पर 1000 mg की दवा सप्लाई की गई. अगर दस्तावेजों में यह अंतर मौजूद है तो जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि टेंडर की शर्तों से अलग strength वाली दवा क्यों स्वीकार की गई और उसके लिए किस स्तर पर मंजूरी दी गई।
सप्लायर के Drug Licence पर भी सवाल
शिकायत में सप्लायर के Drug Licence को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. आरोप है कि टेंडर की शर्तों के अनुसार सप्लायर के पास Retail और Wholesale दोनों तरह के जरूरी लाइसेंस होने चाहिए थे. यह भी दावा किया गया है की संबंधित सप्लायर के Retail Drug Licence को लेकर विरोधाभास सामने आया है. यह भी जांच का विषय होगा कि टेंडर जारी होने और सप्लायर का चयन किए जाने के समय सभी जरूरी लाइसेंस वैध और उपलब्ध थे या नहीं.
अस्पताल प्रशासन ने क्या कहा?
इस मामले में अस्पताल प्रशासन का पक्ष भी सामने आया है. कार्यक्रम में संवाददाता के मुताबिक लोकनायक अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर ने कथित अनियमितताओं की जानकारी होने से इनकार किया. बताया गया कि अस्पताल में दवाओं की खरीद के लिए अलग Purchase Committee काम करती है. मेडिकल डायरेक्टर ने कहा कि उनके पास बड़ी संख्या में फाइलें आती हैं और हर फाइल की व्यक्तिगत जांच करना संभव नहीं है. दवाओं की कीमत और खरीद से जुड़े सवालों को उन्होंने जांच का विषय बताया और मामले की जांच के बाद जवाब देने की बात कही. संबंधित सप्लायर से भी प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई. कार्यक्रम में बताया गया कि सप्लायर ने अपनी लीगल टीम से बात करने के बाद जवाब देने की बात कही थी.
CBI जांच पर टिकी नजर
मामले से जुड़े सभी दस्तावेज, बिल और अन्य रिकॉर्ड सीबीआई को उपलब्ध कराए गए हैं. कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि जांच के सिलसिले में शिकायतकर्ता से कुछ सैंपल और दस्तावेज मांगे गए हैं.
अब जांच का मुख्य सवाल यही है कि क्या टेंडर की शर्तों से लेकर दवा की खरीद और भुगतान तक किसी नियम का उल्लंघन हुआ? क्या अस्पताल ने बाजार में उपलब्ध कम कीमत वाले विकल्पों के बावजूद महंगी दवाइयां खरीदीं? क्या Generic, Branded और DPCO कैटेगरी का सही तरीके से इस्तेमाल हुआ? और अगर सरकारी धन का नुकसान हुआ है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?