भारत के इंटरनेट बूम के रास्ते में समंदर के नीचे छिपा खतरा, मुंबई में केंद्रित 13 समुद्री केबल

भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में आगे बढ़ रहा है। देश में इंटरनेट यूजर्स, डेटा सेंटर और डिजिटल सेवाओं का विस्तार लगातार हो रहा है, लेकिन इस पूरे डिजिटल नेटवर्क की एक बड़ी कमजोरी समुद्र के नीचे छिपी हुई है।
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भारत के इंटरनेट बूम पर समुद्र के नीचे खतरा?

भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में आगे बढ़ रहा है। देश में इंटरनेट यूजर्स, डेटा सेंटर और डिजिटल सेवाओं का विस्तार लगातार हो रहा है, लेकिन इस पूरे डिजिटल नेटवर्क की एक बड़ी कमजोरी समुद्र के नीचे छिपी हुई है। भारत की अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए इस्तेमाल होने वाली समुद्री केबलों का बड़ा हिस्सा मुंबई के पास एक छोटे से तटीय इलाके में केंद्रित है।

मुंबई के वर्सोवा के आसपास करीब छह किलोमीटर के दायरे में भारत की 18 अंतरमहाद्वीपीय समुद्री केबलों में से कम से कम 13 समुद्र से बाहर निकलती हैं। ये केबल भारत को यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया से जोड़ने वाली करीब 95 फीसदी अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ पहुंचाती हैं।

एक जगह पर इतनी केबलें क्यों चिंता की बात?

समुद्र के नीचे बिछी इन केबलों को इंटरनेट की ‘हाईवे’ कहा जा सकता है। ऑप्टिकल फाइबर से बनी ये केबल प्रकाश के संकेतों के जरिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के बीच डेटा पहुंचाती हैं। दुनियाभर में करीब 14 लाख किलोमीटर लंबी समुद्री केबलें बिछी हुई हैं और वैश्विक संचार का लगभग 99 फीसदी हिस्सा इन्हीं के जरिए चलता है।

तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की अन्वेशा सेन के मुताबिक, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इन केबलों का एक ही इलाके में केंद्रित होना है। अगर दुर्घटना या किसी दूसरे कारण से एक साथ कई केबलें क्षतिग्रस्त होती हैं तो यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया की ओर जाने वाली भारत की बड़ी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा भारत इंटरनेट से कट जाएगा। नेटवर्क में वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं और ट्रैफिक को चेन्नई, कोच्चि जैसे दूसरे लैंडिंग प्वाइंट्स की तरफ मोड़ा जा सकता है। लेकिन इससे इंटरनेट की गति और डेटा पहुंचने में लगने वाले समय पर असर पड़ सकता है।

इसका सीधा असर बैंकिंग, शेयर बाजार, क्लाउड सेवाओं और सरकारी नेटवर्क जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं पर पड़ सकता है। एआई के बढ़ते इस्तेमाल के दौर में यह चुनौती और गंभीर हो सकती है, क्योंकि एआई सिस्टम को बड़ी मात्रा में डेटा बेहद तेज गति से ट्रांसफर करने की जरूरत होती है।

भारत डेटा की खपत में आगे, लेकिन केबल नेटवर्क में पीछे

सस्ता डेटा और तेजी से बढ़ते इंटरनेट इस्तेमाल ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट बाजारों में शामिल कर दिया है। 2025 के अंत तक देश में ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं की संख्या एक अरब से ज्यादा हो चुकी थी। भारत दुनिया के कुल डेटा ट्रैफिक का करीब 20 फीसदी इस्तेमाल करता है, लेकिन समुद्र के नीचे बिछी वैश्विक केबलों में भारत की हिस्सेदारी करीब 3 फीसदी ही है। ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम के मुताबिक, भारत में 21 केबल लैंडिंग स्टेशन हैं। ये वे जगहें हैं जहां समुद्र के नीचे आने वाली केबलें जमीन पर मौजूद नेटवर्क से जुड़ती हैं। इसके मुकाबले दुनियाभर में करीब 1,900 सक्रिय और प्रस्तावित केबल लैंडिंग स्टेशन हैं।

ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम की अध्यक्ष अरुणा सुंदरराजन के मुताबिक, “हमें केबल लैंडिंग स्टेशनों की संख्या कई गुना बढ़ानी होगी।”

यही भारत के डिजिटल विस्तार का एक बड़ा विरोधाभास है। देश डेटा सेंटर, क्लाउड और एआई के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन दुनिया से जोड़ने वाले भौतिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में अभी भी कई कमियां हैं।

भारत की कई समुद्री केबलें हो चुकी हैं पुरानी

एक और चिंता केबलों की उम्र को लेकर है। तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के शोध के मुताबिक, भारत की 18 अंतरराष्ट्रीय समुद्री केबलों में से 11 की उम्र 20 साल से ज्यादा हो चुकी है। जबकि ऐसी केबल प्रणालियों की अनुमानित परिचालन अवधि करीब 25 साल मानी जाती है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी लाइटस्टॉर्म के ग्रुप सीईओ और एमडी अमाजित गुप्ता के मुताबिक, भारत में आने वाली कई केबलें अपनी आर्थिक उपयोग अवधि के अंत के करीब पहुंच रही हैं और इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। केबलों का खराब होना भी कोई असामान्य घटना नहीं है। दुनिया में हर साल करीब 150 से 200 समुद्री केबल क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं होती हैं। इनमें ज्यादातर मामले किसी जानबूझकर किए गए हमले की वजह से नहीं होते। मछली पकड़ने वाली नौकाओं की गतिविधियां, जहाजों के लंगर, प्राकृतिक आपदाएं और उपकरणों में खराबी समुद्री केबलों को नुकसान पहुंचाने के आम कारण हैं।

केबल टूटने पर भारत को विदेशी जहाजों पर निर्भर रहना पड़ता है

भारत की एक बड़ी कमजोरी सिर्फ केबलों की संख्या या उनकी लोकेशन नहीं है। समस्या यह भी है कि समुद्र के नीचे बिछी केबलों की मरम्मत के लिए भारत के पास अपना घरेलू केबल रिपेयर जहाज नहीं है। केबल में खराबी आने पर विदेशी जहाजों को बुलाना पड़ता है। इसके बाद उन्हें भारतीय समुद्री क्षेत्र में काम करने के लिए जरूरी अनुमति और लाइसेंस हासिल करना होता है। इससे मरम्मत में अतिरिक्त समय लग सकता है।

अन्वेशा सेन के मुताबिक, “भारतीय समुद्री क्षेत्र में होने वाली हर केबल खराबी के लिए दुबई या सिंगापुर से आने वाले विदेशी मरम्मत जहाजों पर निर्भर रहना पड़ता है।” लाइटस्टॉर्म के अमाजित गुप्ता के मुताबिक, “भारत के लिए बड़ा ढांचागत मुद्दा ट्रैफिक को दूसरे रास्तों से भेजने की क्षमता नहीं, बल्कि मरम्मत की क्षमता है।” यानी किसी केबल के टूटने के बाद वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध होना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी यह है कि क्षतिग्रस्त केबल को जल्द से जल्द ठीक किया जा सके।

एआई और डेटा सेंटर बढ़ा रहे हैं दबाव

भारत में डेटा सेंटरों का तेजी से विस्तार हो रहा है। ये ऐसे कंप्यूटिंग केंद्र हैं जहां बड़ी मात्रा में डेटा स्टोर किया जाता है और एआई मॉडल समेत कई डिजिटल सेवाओं को चलाया जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में स्थापित डेटा सेंटर क्षमता 2020 में 375 मेगावाट थी, जो अब करीब 1,575 मेगावाट तक पहुंच गई है।

लेकिन नई डेटा सेंटर क्षमता के मुकाबले समुद्री केबल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में ज्यादा समय लग सकता है। ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम की अरुणा सुंदरराजन के मुताबिक, “समुद्र-तल की केबलों की योजना बनाने में ही तीन से चार साल लग जाते हैं। इसके बाद केबल बिछाने में उसकी लंबाई के अनुसार दो साल तक लग सकते हैं।”

ऐसे में अगर डेटा सेंटर और एआई की मांग तेजी से बढ़ती रही, तो आने वाले समय में कनेक्टिविटी क्षमता और मांग के बीच अंतर पैदा हो सकता है।

16 एजेंसियों की मंजूरी भी बन रही है बाधा

भारत में समुद्री केबल बिछाने और उनकी मरम्मत से जुड़ी प्रक्रिया में कई सरकारी एजेंसियां शामिल होती हैं। इनमें दूरसंचार, रक्षा, गृह मंत्रालय, नौवहन, बंदरगाह, पर्यावरण और राज्य सरकारें शामिल हैं। अरुणा सुंदरराजन के मुताबिक, एक केबल लैंडिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए करीब 16 मंत्रालयों और विभागों से लगभग 50 मंजूरियां लेनी पड़ सकती हैं।

उनका कहना है कि “मुख्य समस्या तकनीकी क्षमता की कमी नहीं है, बल्कि बिखरी हुई प्रशासनिक व्यवस्था है।”

विशेषज्ञों का सुझाव है कि केबल से जुड़े मामलों के लिए एक प्रमुख नोडल एजेंसी हो और मरम्मत जहाजों को अनुमति देने के लिए सिंगल-विंडो सिस्टम बनाया जाए। इसके अलावा दोनों तटों और द्वीपीय क्षेत्रों में पहले से कई केबल लैंडिंग साइट चिन्हित कर उन्हें जरूरी मंजूरियां दी जा सकती हैं।

भारत उठा रहा है कई कदम

भारत अब समुद्र के नीचे बिछी केबल प्रणालियों को महत्वपूर्ण दूरसंचार बुनियादी ढांचे के रूप में मान्यता दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे इन परियोजनाओं को सुरक्षा और प्रशासनिक स्तर पर प्राथमिकता देने में मदद मिल सकती है।

केबल मार्गों और लैंडिंग स्टेशनों की सुरक्षा के लिए संरक्षित क्षेत्र बनाने, लंगर डालने और ट्रॉलिंग जैसी गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने के सुझाव भी दिए जा रहे हैं।

तकनीक के जरिए भी केबलों की सुरक्षा मजबूत की जा सकती है। ‘डिस्ट्रिब्यूटेड अकॉस्टिक सेंसिंग’ तकनीक ऑप्टिकल फाइबर को सेंसर की तरह इस्तेमाल कर सकती है। इससे जहाजों, लंगर या पानी के भीतर चलने वाली गतिविधियों से पैदा होने वाले कंपन का पता लगाया जा सकता है और संभावित खतरे की पहले पहचान की जा सकती है।

मुंबई पर निर्भरता कम करने की कोशिश

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को समुद्री केबल नेटवर्क में भौगोलिक विविधता बढ़ानी होगी। इसके लिए मुंबई के अलावा देश के दूसरे तटीय क्षेत्रों में भी नए लैंडिंग स्टेशन और केबल मार्ग विकसित करने होंगे। लाइटस्टॉर्म के नेतृत्व में बनाई जा रही आई-2एसईए केबल प्रणाली भारत को मलेशिया और सिंगापुर से जोड़ने की योजना का हिस्सा है। इसके भारत में दो लैंडिंग प्वाइंट होंगे। इनमें एक मछलीपट्टनम में और दूसरा दक्षिण चेन्नई में प्रस्तावित है। इस तरह नए मार्ग भारत की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बांटने में मदद कर सकते हैं।

भारत में इंटरनेट और डेटा की मांग तेजी से बढ़ रही है। डेटा सेंटर और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार इस मांग को और बढ़ाने वाला है। ऐसे में देश के लिए सिर्फ ज्यादा डेटा सेंटर बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें दुनिया से जोड़ने वाली समुद्री केबलों, लैंडिंग स्टेशनों और मरम्मत क्षमता को भी उसी गति से मजबूत करना होगा। भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के इस दौर में उसकी इंटरनेट कनेक्टिविटी किसी एक इलाके, पुराने केबल नेटवर्क या विदेशी मरम्मत क्षमता पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न रहे।

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