नई दिल्ली: किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होता कि उसमें कितने बड़े नेता शामिल हुए, कितनी तस्वीरें सामने आईं या कितने पन्नों की घोषणा जारी हुई। असली सवाल यह होता है कि सम्मेलन खत्म होने के बाद मेजबान देश की स्थिति पहले से कितनी मजबूत हुई। BRICS के 18वें शिखर सम्मेलन के बाद भारत के सामने भी यही सवाल है कि दिल्ली ने दुनिया को क्या दिया और बदले में भारत क्या लेकर निकला?
12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में हुए BRICS सम्मेलन को अगर सिर्फ एक राजनयिक आयोजन माना जाए तो शायद इसकी असली कहानी छूट जाएगी। रूस, चीन सहित 11 सदस्य देशों की मौजूदगी के बीच भारत ने एक साथ कई संदेश दिए। सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि भारत अब वैश्विक राजनीति में किसी एक खेमे का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि अपनी शर्तों और अपने हितों के साथ आगे बढ़ना चाहता है। यही इस पूरे सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है।
BRICS की मेज पर भारत की भूमिका बदली
BRICS का विस्तार हो चुका है। अब यह सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का मंच नहीं रहा। एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के कई महत्वपूर्ण देश इसका हिस्सा हैं। भारतीय सरकार के अनुसार, BRICS के 11 सदस्य दुनिया की करीब आधी आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे समूह की अध्यक्षता करना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है। उससे भी बड़ी चुनौती उन देशों को साथ लेकर चलने की है, जिनके हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं। भारत ने यही काम करने की कोशिश की। नई दिल्ली घोषणा पर सदस्य देशों की सहमति बनी। पश्चिम एशिया का संकट, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, AI, जलवायु और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे। इससे संकेत मिलता है कि भारत ने BRICS को केवल बयान देने वाले मंच के बजाय व्यावहारिक सहयोग की दिशा में ले जाने की कोशिश की।
मोदी की असली कूटनीतिक परीक्षा
सम्मेलन की असली कहानी घोषणापत्र के साथ-साथ उन मुलाकातों में भी दिखाई दी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कीं। एक तरफ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हैं, दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और इसी समय अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इन तीनों रिश्तों को एक साथ कैसे साधा जाए। यही वह जगह है जहां मोदी की विदेश नीति की परीक्षा होती है। भारत का संदेश इस सम्मेलन में स्पष्ट रहा कि नई दिल्ली किसी दूसरे देश के विरोध में अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगी। भारत रूस के साथ अपने पुराने रिश्ते रखेगा, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और मतभेद के बावजूद संवाद करेगा और अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी भी आगे बढ़ाएगा। आज की दुनिया में यही संतुलन भारत की बड़ी कूटनीतिक ताकत बन सकता है।
पुतिन के साथ दोस्ती का मतलब क्या?
BRICS के दौरान मोदी और पुतिन की मुलाकात पर दुनिया की नजर थी। रूस के साथ भारत के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रक्षा से लेकर ऊर्जा तक दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिम और रूस के बीच टकराव बढ़ा, तब भारत पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का दबाव आया। भारत ने अपनी नीति नहीं बदली। ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए रूस के साथ आर्थिक संबंध जारी रखे गए। साथ ही भारत ने युद्ध के समाधान और बातचीत की जरूरत पर जोर देना जारी रखा। मोदी-पुतिन बातचीत में ऊर्जा, व्यापार, रक्षा, अंतरिक्ष और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे सामने आए। इससे यह संदेश गया कि भारत रूस के साथ अपनी दोस्ती किसी तीसरे देश को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के लिए रखता है।
शी जिनपिंग के साथ तस्वीर क्या बताती है?
अगर पुतिन के साथ मुलाकात भारत की रणनीतिक स्वायत्तता दिखाती है तो शी जिनपिंग के साथ बातचीत भारत की व्यावहारिक कूटनीति को सामने रखती है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन रिश्ते आसान नहीं रहे हैं। सीमा पर शांति और भरोसा दोनों देशों के संबंधों की बुनियादी शर्त हैं। मोदी और शी की मुलाकात में सीमा पर शांति, पहले हुए समझौतों, व्यापार और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत-चीन संबंध सामान्य हो गए हैं। ऐसा नहीं है। लेकिन राजनीति में कभी-कभी बातचीत का होना भी अपने आप में एक संदेश होता है। भारत ने यह संकेत दिया कि चीन से मुकाबला अपनी जगह है, लेकिन संवाद बंद करना भारत के हित में नहीं है।
Global South की आवाज क्या भारत आगे आ रहा है?
अब सवाल यह है कि क्या भारत Global South का नेता बन रहा है? इस मामले में सावधानी जरूरी है। Global South कोई एक राजनीतिक संगठन नहीं है और उसके भीतर भी अलग-अलग तरह के हित हैं। इसलिए भारत को उसका निर्विवाद नेता कहना सही नहीं होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत Global South की आवाज को वैश्विक मंचों पर मजबूती से रखने वाले सबसे महत्वपूर्ण देशों में शामिल हो गया है। भारत लगातार कहता रहा है कि विकासशील देशों की आबादी और आर्थिक ताकत के अनुपात में वैश्विक संस्थाओं में उनकी भूमिका बढ़नी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधन, तकनीक तक पहुंच, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों को भारत अपनी विदेश नीति के बड़े हिस्से के रूप में सामने रख रहा है। यही वजह है कि BRICS भारत के लिए सिर्फ आर्थिक मंच नहीं है। यह वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में अपनी जगह मजबूत करने का माध्यम भी है।
अमेरिका के लिए BRICS का क्या संदेश?
BRICS को सिर्फ अमेरिका विरोधी मंच बताना आसान है, लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। भारत खुद इस बात पर जोर देता रहा है कि BRICS पश्चिम विरोधी गठबंधन नहीं है। फिर भी अमेरिका के लिए एक संदेश जरूर है कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति अब कुछ देशों तक सीमित नहीं रह गई है। BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि BRICS की कोई साझा मुद्रा अभी नहीं बनी है। डॉलर खत्म करने का कोई तत्काल फैसला भी नहीं हुआ है। असल चर्चा वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने की है। अगर आने वाले वर्षों में यह व्यवस्था मजबूत होती है तो वैश्विक वित्तीय ढांचे पर इसका असर पड़ सकता है।
असली फायदा क्या भारत की अर्थव्यवस्था को मिलेगा?
यहीं से BRICS की सफलता का अगला अध्याय शुरू होगा। सम्मेलन में निवेश, व्यापार, तकनीक, सप्लाई चेन, AI, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर चर्चा हुई। लेकिन सिर्फ चर्चा आर्थिक फायदा नहीं बनती। फायदा तब होगा जब निवेश आएगा, व्यापार बढ़ेगा, नई परियोजनाएं शुरू होंगी और भारतीय कंपनियों को नए बाजार मिलेंगे। भारत के लिए BRICS का एक बड़ा अवसर यह है कि वह तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार और निवेश के नए रास्ते खोल सकता है। लेकिन इसके लिए भारत को सिर्फ सम्मेलन की मेजबानी से आगे जाना होगा। दिल्ली में बनी सहमति को जमीन पर उतारना होगा।
अगली लड़ाई AI और तकनीक की
BRICS का भविष्य केवल तेल, डॉलर और व्यापार से तय नहीं होगा। AI, critical minerals, cyber security और supply chains आने वाले समय की असली ताकत बनने जा रहे हैं। चीन AI सहयोग में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है। भारत भी AI को केवल तकनीकी शक्ति नहीं, बल्कि विकास के साधन के रूप में देख रहा है। यहां भारत के पास बड़ा अवसर है। भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में जो मॉडल बनाया है, उसे Global South के दूसरे देशों तक पहुंचाया जा सकता है। अगर भारत ऐसा कर पाया तो BRICS उसके लिए सिर्फ व्यापार का मंच नहीं रहेगा, बल्कि तकनीकी और विकासात्मक नेतृत्व का मंच भी बन सकता है।
तो क्या दुनिया में भारत का डंका बजा?
हां, लेकिन इस बात को नारे की तरह नहीं, बदलाव की तरह समझना होगा। भारत का वजन इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था बड़ी है, बाजार बड़ा है, रणनीतिक स्थिति महत्वपूर्ण है और दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत के साथ संबंध रखना चाहती हैं। मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति ने इस बढ़ते प्रभाव को और दृश्य बनाया है। पुतिन के साथ करीबी संवाद हो, शी जिनपिंग के साथ बातचीत हो या पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी—मोदी की कोशिश यही दिखाई देती है कि भारत किसी एक खांचे में फिट न हो। यही वजह है कि आज दुनिया भारत को सिर्फ एक बाजार के रूप में नहीं देखती। भारत को एक ऐसी शक्ति के रूप में देखा जा रहा है जो कई पक्षों के बीच संवाद और संतुलन की भूमिका निभा सकती है।
क्या मोदी दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं?
यह सवाल अभी खुला है। किसी नेता को वैश्विक नेता बनाने के लिए केवल लोकप्रियता या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मौजूदगी काफी नहीं होती। इसके लिए मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, सैन्य ताकत, संस्थागत विश्वसनीयता और संकट के समय भरोसेमंद फैसलों की जरूरत होती है। मोदी ने भारत की वैश्विक भूमिका को जरूर बड़ा किया है। लेकिन इस भूमिका को स्थायी नेतृत्व में बदलने की असली चुनौती अभी बाकी है और शायद यही BRICS 2026 का सबसे महत्वपूर्ण सबक भी है। सम्मेलन खत्म हो गया है। अब असली काम शुरू हुआ है। भारत ने दुनिया को दिखाया कि वह रूस से रिश्ते रखते हुए चीन से बातचीत कर सकता है, अमेरिका से साझेदारी बढ़ाते हुए Global South की आवाज उठा सकता है और अलग-अलग हितों वाले देशों को एक मंच पर साथ ला सकता है। अब देखना यह है कि यह कूटनीतिक ताकत कितनी जल्दी आर्थिक ताकत, तकनीकी ताकत और वैश्विक प्रभाव में बदलती है।क्योंकि अंत में किसी देश का डंका सिर्फ भाषणों से नहीं बजता। डंका तब बजता है जब दुनिया आपकी बात सुने, आपके हितों को गंभीरता से ले और आपके बिना बड़े फैसले अधूरे समझे। BRICS 2026 के बाद भारत उस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।