भारत ने 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। इस बार भारत के सामने सिर्फ सम्मेलन को सफल बनाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देशों को एक मंच पर साथ लाने की भी परीक्षा थी।
BRICS अब पहले के मुकाबले काफी बड़ा और जटिल समूह बन चुका है। चीन, रूस और भारत जैसे प्रमुख देशों के साथ ईरान, यूएई, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी समूह का हिस्सा हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब BRICS के भीतर ही कई मुद्दों पर मतभेद हैं, तो आखिर भारत को इससे क्या हासिल हो रहा है?
इस सवाल पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ विशेषज्ञों को चिंता है कि BRICS के मजबूत होने का फायदा चीन को ज्यादा मिल सकता है, जबकि दूसरे विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मंच भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बढ़ाने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करने का मौका देता है।

क्या चीन BRICS का इस्तेमाल अपने हित में कर सकता है?
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर राजेश राजगोपाल BRICS को लेकर काफी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि अगर BRICS भविष्य में एक ज्यादा प्रभावी और मजबूत समूह बनता है, तो चीन इसका इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर सकता है।
राजगोपाल के मुताबिक, चीन की आर्थिक और राजनीतिक ताकत BRICS के कई दूसरे सदस्यों से काफी ज्यादा है। ऐसे में संगठन के भीतर शक्ति का संतुलन चीन के पक्ष में झुकने की आशंका रहती है। उनका तर्क है कि भारत को ऐसे किसी भी ढांचे से सावधान रहना चाहिए, जिसका इस्तेमाल चीन भारत को अलग-थलग करने या उसके प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के प्रभाव को कमजोर करने के लिए कर सके।
यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत एक तरफ BRICS में चीन के साथ काम करता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप जैसे देशों के साथ भी अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है।
लेकिन क्या BRICS भारत के लिए रणनीतिक विकल्प बढ़ाता है?
दूसरी तरफ, फ्रांस में भारत के पूर्व राजदूत मोहन कुमार का नजरिया अलग है। उनका मानना है कि BRICS भारत को अपनी विदेश नीति में ज्यादा रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराता है।
उनके मुताबिक, BRICS के जरिए भारत वैश्विक राजनीति को ज्यादा बहुध्रुवीय बनाने की दिशा में काम कर सकता है। आज की अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में भारत के लिए यह जरूरी है कि वह किसी एक शक्ति समूह पर पूरी तरह निर्भर न हो।
इसी वजह से BRICS भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति के अनुरूप भी दिखाई देता है। भारत BRICS में रूस और चीन के साथ काम करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह पश्चिमी देशों के खिलाफ खड़ा हो गया है।

भारत BRICS को चीन के प्रभाव का मंच नहीं बनाना चाहता
कजाकिस्तान की सुलेमान डेमिरेल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर राज कुमार शर्मा के मुताबिक, भारत एक मजबूत BRICS चाहता है, लेकिन वह नहीं चाहता कि यह संगठन चीन के रणनीतिक प्रभाव का साधन बन जाए।
उनके अनुसार, यही भारत के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। नई दिल्ली को BRICS के भीतर चीन और रूस जैसे देशों के साथ सहयोग करना है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि संगठन किसी एक देश के एजेंडे के हिसाब से न चले।
इसी वजह से भारत की भूमिका को एक तरह के ‘ब्रिज बिल्डर’ के तौर पर देखा जा रहा है। भारत कोशिश कर रहा है कि BRICS को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन के बजाय विकास, व्यापार, तकनीक और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों पर सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
BRICS से भारत को आर्थिक फायदा क्या मिल सकता है?
BRICS का एक बड़ा फायदा आर्थिक क्षेत्र में है। समूह के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को बढ़ावा देने पर काम हो रहा है। नई दिल्ली घोषणा में BRICS Payment Task Force के काम का स्वागत किया गया और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार तथा निवेश के विकल्पों पर आगे काम करने की बात कही गई है। हालांकि, BRICS ने किसी साझा मुद्रा की घोषणा नहीं की है।
भारत के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में कुछ देशों के साथ व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम करने के अतिरिक्त विकल्प मिलें। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार में प्रतिबंध, टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं।
न्यू डेवलपमेंट बैंक भी भारत के लिए अहम
BRICS की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी NDB है। इसका उद्देश्य उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में इंफ्रास्ट्रक्चर और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।
नई दिल्ली घोषणा में NDB की भूमिका बढ़ाने, स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण का विस्तार करने और विकास परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने पर जोर दिया गया है।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए पश्चिमी वित्तीय संस्थानों के अलावा एक अतिरिक्त बहुपक्षीय विकल्प मौजूद रहता है।
ग्लोबल साउथ में भारत की आवाज मजबूत
BRICS भारत को ग्लोबल साउथ के देशों के बीच अपनी भूमिका मजबूत करने का भी मौका देता है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी की मांग करता रहा है।
BRICS के जरिए भारत इस मांग को चीन और रूस जैसे देशों के साथ मिलकर आगे बढ़ा सकता है, हालांकि दोनों देशों के साथ भारत के अपने मतभेद भी हैं।
2026 के शिखर सम्मेलन में भारत ने वैश्विक संस्थानों में सुधार, विकासशील देशों की अधिक भागीदारी और बहुपक्षीय व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्व वाला बनाने पर जोर दिया।
BRICS अब सिर्फ राजनीति नहीं, AI और तकनीक पर भी फोकस कर रहा
BRICS का एजेंडा अब सिर्फ भू-राजनीति तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली घोषणा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर समावेशी, सुरक्षित और जिम्मेदार विकास पर जोर दिया गया।
भारत की अध्यक्षता में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, औद्योगिक क्षमता और AI जैसे क्षेत्रों में सहयोग की नई पहल सामने आई हैं। इससे भारत को अपनी डिजिटल विशेषज्ञता और अनुभव को दूसरे विकासशील देशों के साथ साझा करने का अवसर मिलता है।
BRICS-NDB Knowledge Portal की शुरुआत भी इसी दिशा में हुई है, जिसके जरिए सदस्य देशों के विकास से जुड़े अनुभव और तकनीकी ज्ञान साझा किए जा रहे हैं।
सबसे बड़ी चुनौती- BRICS के भीतर मतभेद
हालांकि BRICS की ताकत बढ़ी है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस और पश्चिम के बीच लंबे समय से तनाव है। पश्चिम एशिया में ईरान और खाड़ी देशों के बीच भी मतभेद रहे हैं।
2026 के सम्मेलन से पहले यही चिंता थी कि इन मतभेदों के कारण समूह किसी साझा रुख पर पहुंच पाएगा या नहीं। लेकिन 12 सितंबर को BRICS देशों ने नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से मंजूर कर लिया, जिसमें आर्थिक सहयोग, भुगतान व्यवस्था, विकास, AI और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों पर साझा रुख सामने आया।

तो आखिर भारत को BRICS से क्या हासिल हो रहा है?
विशेषज्ञों की राय को देखें तो BRICS को भारत के लिए न पूरी तरह फायदे का मंच कहा जा सकता है और न ही नुकसान का। इसका फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि भारत इसका इस्तेमाल किस तरह करता है।
एक तरफ चीन के बढ़ते प्रभाव का जोखिम है। दूसरी तरफ भारत को रूस, चीन, ईरान, खाड़ी देशों और ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों के साथ एक ही मंच पर बातचीत करने का अवसर मिलता है।
आर्थिक क्षेत्र में स्थानीय मुद्रा में व्यापार, NDB के जरिए वित्तीय सहयोग और सप्लाई चेन को मजबूत करने की कोशिश भारत के लिए उपयोगी हो सकती है। वहीं, AI, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, कृषि और कौशल जैसे क्षेत्रों में सहयोग से व्यावहारिक फायदे हासिल किए जा सकते हैं।
इसलिए भारत के लिए BRICS की सबसे बड़ी उपयोगिता शायद यही है कि वह इसे किसी एक देश या पश्चिम-विरोधी गठबंधन के बजाय बहुपक्षीय सहयोग और रणनीतिक विकल्प बढ़ाने वाले मंच के रूप में इस्तेमाल करे। यही संतुलन भारत को BRICS में चीन के प्रभाव से बचाते हुए अपने हितों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।