राजनीति में केवल संगठन का मजबूत होना और कार्यकर्ताओं का होना ही काफी नहीं होता, बल्कि जनता के बीच अपने पक्ष में नैरेटिव सेट करना भी उतना ही जरूरी है। आज के समय में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के सामने यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। पार्टी का कैडर और जमीनी संगठन अपनी जगह सही ढंग से काम कर रहा है, लेकिन जब बात वैचारिक और चुनावी नैरेटिव की आती है, तो पार्टी अक्सर पीछे छूट जाती है।
चुनाव जीतने और जनता का समर्थन हासिल करने के लिए सिर्फ जमीन पर काम करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में धारणा (Narrative) की लड़ाई भी जीतनी पड़ती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएसपी अपनी पारंपरिक शैली से बाहर निकलकर आक्रामक तरीके से राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में उतनी सफल नहीं हो पा रही है, जितनी कि अन्य पार्टियां हो रही हैं। यही वजह है कि तमाम तैयारियों के बावजूद चुनावी परिणामों में इसका असर वैसा नहीं दिखता जैसी उम्मीद की जाती है।