उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसी बीच द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने के साथ-साथ चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
रिपोर्ट में किन मुद्दों पर आपत्ति का जिक्र?
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ ऐसे फैसलों पर सवाल उठाए, जिन्हें उन्होंने अपने संज्ञान या मंजूरी के बिना लिए जाने की बात कही। इनमें Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटा के IT सिस्टम को केंद्रीकृत करना, पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से जुड़ी अपील और गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने जैसे मामले शामिल बताए गए हैं। रिपोर्ट में एक दिन में चार आपत्तियां दर्ज किए जाने का भी उल्लेख है।
अखिलेश यादव ने क्या कहा?
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्यों को अपने विचार रखने और उनकी बात सुने जाने की स्वतंत्रता नहीं है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
अखिलेश यादव ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की अपील भी की है। उनके बयान में चुनाव आयोग के फैसलों और उसकी आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?
दूसरी ओर, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक मतभेद की तस्वीर को खारिज किया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के सूत्रों ने कहा कि SIR समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए। यह स्पष्टीकरण उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें दो चुनाव आयुक्तों की ओर से 14 आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया था।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध जानकारी में दो अलग-अलग पहलू सामने आते हैं—एक ओर रिपोर्ट में दो आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों का विवरण है, जबकि दूसरी ओर चुनाव आयोग के सूत्र इन आपत्तियों के बावजूद सभी अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत बता रहे हैं।