कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में लगाए गए प्रतिबंधों और पुलिस की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को अहम निर्देश दिए. जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अधिकारियों से दिल्ली में आवाजाही सामान्य करने, इंटरनेट सेवाएं बहाल रखने और मेट्रो को सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलाने को कहा. अदालत ने गैरजरूरी बैरिकेड हटाने का भी निर्देश दिया और मामले में दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा.
सुप्रीम कोर्ट में मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी के कथित उल्लंघन को लेकर दायर अवमानना याचिका और हिरासत में लिए गए लोगों से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई हुई. याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि अदालत के पहले के निर्देशों के बावजूद दिल्ली में लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंध जारी रहे. अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं, लेकिन आम लोगों के अधिकारों और उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों को अनावश्यक रूप से बाधित नहीं किया जाना चाहिए.
मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं सामान्य करने पर जोर
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित किए गए तथा जनपथ-कर्तव्य पथ क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएं बंद रहीं. उन्होंने इसे अदालत के आदेश की अवमानना बताते हुए हस्तक्षेप की मांग की.
याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि दिल्ली में आवाजाही पर लगी पाबंदियां हटाई जाएं, मेट्रो और ट्रेन सेवाएं सुचारू रूप से चलाई जाएं तथा शहर में लगाए गए बैरिकेड हटाए जाएं. अदालत ने सार्वजनिक परिवहन को सामान्य रूप से संचालित करने और लोगों को अपने पेशे से जुड़े काम करने में बाधा न आने देने पर जोर दिया.
जरूरत वाली जगहों पर ही रहें बैरिकेड
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में जगह-जगह लगाए गए बैरिकेड हटाए जाएं और उन्हें केवल उन्हीं स्थानों पर रखा जाए, जहां उनकी वास्तविक जरूरत हो. अदालत ने लोगों की आवाजाही सामान्य करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.
जजो बेंच ने यह स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर ऐसे व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते, जिनसे आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी हो. अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19(2) के संदर्भ में प्रतिबंधों की वैधता पर भी चर्चा की. इस अनुच्छेद के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.
पुलिस की कार्रवाई और हिरासत पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन से पहले बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया. वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दावा किया कि छात्रों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया गया तथा पुलिस की कार्रवाई से सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ.
कुछ वकीलों ने आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए लोगों को अपने वकीलों से मिलने में परेशानी हुई. अदालत के सामने पुलिसकर्मियों के पहचान बैज नहीं लगाने और वकीलों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें भी रखी गईं. ये आरोप याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाए गए, इन पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष और न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग हैं.
जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत लोगों के जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े सवालों की पूरी तरह जांच करेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत मामले के तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद उचित आदेश देगी.
सॉलिसिटर जनरल ने सरकार का पक्ष रखा
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं थीं और कुल 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोका गया था. उनके मुताबिक, सभी स्टेशन शनिवार रात 10 बजे से खोल दिए गए थे.
इस पर अदालत ने सवाल किया कि पहले 57 स्टेशनों को बंद करने की बात सामने आई थी, जबकि बाद में 45 स्टेशनों पर प्रतिबंध लागू होने की जानकारी दी गई. पीठ ने प्रतिबंधित स्टेशनों के चयन का आधार भी पूछा. सरकार की ओर से कहा गया कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए गए थे.
प्रदर्शन के अधिकार पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन कानून के दायरे में होना चाहिए. यह अधिकार पुलिस अधिनियम और लागू नियमों से ऊपर नहीं है. जस्टिस वी. मोहना ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और किसी भी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया.
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस को असीमित अधिकार नहीं मिल जाते. अदालत की जिम्मेदारी नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करना है, चाहे संबंधित व्यक्ति आम नागरिक हो, वकील हो या पुलिसकर्मी.
मंगलवार को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंधों और कथित अवमानना से जुड़े मामले में संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है. मामले में आगे की सुनवाई मंगलवार को होने की जानकारी दी गई है. अदालत के निर्देशों का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन और इंटरनेट सेवाओं को सामान्य बनाए रखना, गैरजरूरी बैरिकेडिंग हटाना तथा सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन सुनिश्चित करना है.