अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक मंच पर भारी हलचल मचा दी है। इस विवादास्पद कदम ने तुरंत दुनिया के शक्तिशाली देशों के बीच प्रतिक्रियाओं की बाढ़ ला दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून और शक्ति संतुलन पर एक नई बहस छिड़ गई है।
जहां एक ओर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि स्थिति सामान्य होने तक अमेरिका वेनेजुएला के हालात संभालेगा। इसके लिए एक खास टीम भी गठित की गई है। वहीं, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इस कार्रवाई को सशर्त समर्थन दिया है। मेलोनी ने साफ किया कि बाहरी सैन्य ताकत से सत्ता बदलना गलत है, लेकिन अगर देश की सुरक्षा को खतरा हो या सरकारी संस्थाएं ड्रग तस्करी जैसे मामलों में शामिल हों, तो रक्षात्मक कार्रवाई को पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता।
अमेरिकी कार्रवाई का रूस और चीन ने कड़ा विरोध किया है। रूसी विदेश मंत्रालय ने इसे ‘सशस्त्र आक्रमण’ बताते हुए निंदा की है और अमेरिका से तुरंत कार्रवाई पर पुनर्विचार करने तथा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को रिहा करने की अपील की है। रूस का मत है कि कूटनीति और बातचीत ही समस्याओं का एकमात्र हल है।
चीन ने भी इस कार्रवाई की तीखी आलोचना की है। चीनी विदेश मंत्रालय ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और वेनेजुएला की संप्रभुता पर सीधा हमला बताया है। चीन ने अमेरिका पर ‘दादागिरी’ (Hegemonic Behaviour) का आरोप लगाते हुए कहा कि अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सम्मान करना चाहिए।
कुल मिलाकर, वेनेजुएला संकट ने दुनिया की बड़ी ताकतों को साफ तौर पर विभाजित कर दिया है। यह विवाद न केवल वेनेजुएला के भविष्य को तय करेगा, बल्कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति में शक्ति और कानून की सीमाओं को भी परिभाषित करेगा।









