$500 अरब की भारत-अमेरिका ट्रेड डील क्यों हुई फेल? वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने किया बड़ा खुलासा

अमेरिकी वाणिज्य सचिव
अमेरिकी वाणिज्य सचिव

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दो बड़े देशों के बीच होने वाली $500 अरब डॉलर की ऐतिहासिक ट्रेड डील किसी नीतिगत मतभेद या टैरिफ की वजह से नहीं, बल्कि सिर्फ एक फोन कॉल न होने की वजह से अटक जाए? भारत और अमेरिका के बीच विशाल द्विपक्षीय व्यापार समझौते के फेल होने के पीछे की चौंकाने वाली वजह अब सामने आई है, जिसमें एक वैश्विक नेता के अहंकार ने छह दौर की मेहनत पर पानी फेर दिया।

अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक के हालिया बयान ने उन सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है जो भारत और अमेरिका के बीच $500 अरब डॉलर की ट्रेड डील के रुकने को लेकर लगाई जा रही थीं। छह दौर की बातचीत पूरी हो चुकी थी और डील का मसौदा लगभग तैयार था।

डील क्यों रुकी? सिर्फ एक कॉल की कमी

लुटनिक ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह डील किसी व्यापारिक शर्त, टैरिफ संरचना या नीतिगत मतभेद की वजह से नहीं रुकी, बल्कि सिर्फ इसलिए अटक गई क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अंतिम मंजूरी वाली अहम फोन कॉल नहीं हो पाई।

उन्होंने इंटरव्यू में बताया कि ट्रंप खुद इस डील को अंतिम रूप देने वाले थे, जिसके लिए वह पीएम मोदी के कॉल का इंतजार कर रहे थे। लुटनिक ने खुलासा किया कि जब यह कॉल नहीं हुई (क्योंकि भारत सरकार या पीएम मोदी उस कॉल को लेकर सहज नहीं थे), तो अमेरिका ने व्यक्तिगत अहंकार के चलते भारत के साथ डील को रोक दिया।

टेरिफ वृद्धि का कारण व्यापार नीति नहीं, अहंकार

लुटनिक के बयान के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ का कारण व्यापारिक नीति या शर्तें नहीं थीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण थे। डील रुकने के तुरंत बाद भारत पर पहले 25% और फिर रूसी तेल खरीद के बाद 50% तक का भारी टैरिफ लगाया गया।

उन्होंने बताया कि अमेरिका ने इसी दौरान इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के साथ ट्रेड एग्रीमेंट कर लिए, जबकि भारत के साथ समझौता इन देशों से पहले फाइनल होने की उम्मीद थी। वर्तमान में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार लगभग $191 अरब डॉलर का है, लेकिन लुटनिक ने साफ किया है कि जिन शर्तों पर $500 अरब डॉलर की महत्वाकांक्षी डील लगभग तय मानी जा रही थी, वे अब लागू नहीं हैं और फिलहाल इस पर दोबारा विचार भी नहीं किया जा रहा है।

यह पूरी घटना दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर बड़े व्यापारिक और आर्थिक फैसले कई बार जटिल नीतिगत कारणों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों, अपेक्षाओं और सही समय पर संपर्क की कमी के कारण भी प्रभावित होते हैं।

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