बिहार की राजनीति में अप्रैल में होने वाला राज्यसभा चुनाव अब गर्माहट ला रहा है। पांच खाली हो रही सीटों को लेकर सत्ताधारी एनडीए (NDA) और विपक्षी महागठबंधन आमने-सामने हैं। विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद एनडीए इन सीटों पर अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है, लेकिन असली मुकाबला पांचवी सीट पर है, जहां आंकड़े दोनों गठबंधनों को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
राज्यसभा की इन पांच सीटों पर कब्जा जमाने के लिए सियासी लड़ाई चरम पर पहुंच गई है। यहां जानिए राजनीतिक समीकरण और दांव पर लगी सीटें:
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 41 विधायकों का समर्थन आवश्यक होता है। वर्तमान संख्याबल के अनुसार, एनडीए (NDA) के पास पर्याप्त विधायक हैं, जिससे वह आसानी से 4 सीटें जीत सकता है। चार सीटों को सुरक्षित करने के बाद भी एनडीए के पास 38 अतिरिक्त वोट बच रहे हैं। ये अतिरिक्त वोट उन्हें पांचवीं सीट जीतने की मजबूत स्थिति में डाल रहे हैं। एनडीए की रणनीति स्पष्ट है: जरूरत पड़ने पर छोटे सहयोगियों और निर्दलीयों का समर्थन लेकर पांचवीं सीट भी अपने खाते में करना।
महागठबंधन (Mahagathbandhan) के पास कुल 35 विधायक हैं। पांचवीं सीट पर टक्कर देने के लिए उन्हें एआईएमआईएम (AIMIM) के 5 और बसपा (BSP) के 1 विधायक के समर्थन की सख्त आवश्यकता होगी।
बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए सभी विपक्षी वोटों का एकजुट होना बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। अगर महागठबंधन अपनी एकजुटता बनाए नहीं रख पाता है, तो एनडीए इस सीट पर भी कब्जा कर सकता है।
इस चुनाव के दौरान जेडीयू नेता उपेंद्र कुशवाहा की राज्यसभा वापसी पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उनके अपने विधायक उनसे नाराज़ बताए जा रहे हैं और उनका समर्थन पूरी तरह से सुनिश्चित नहीं है। इसके अलावा, बीजेपी कोटे से अपनी दो सीटें किन नेताओं को देनी हैं, इस पर भी सियासी कयासबाजी तेज है। हर वोट का महत्व बढ़ गया है और जीत-हार का फैसला बहुत कम मार्जिन से होगा।
यह राज्यसभा चुनाव न केवल बिहार की सत्ताधारी ताकत को दर्शाएगा, बल्कि केंद्र के राजनीतिक समीकरणों पर भी दूरगामी असर डालेगा। सभी की निगाहें अब हर विधायक और आने वाले नतीजों पर टिकी हुई हैं, जो तय करेंगे कि राज्यसभा में बिहार की पांच सीटें किसके खाते में जाएंगी।









