पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त जबरदस्त उबाल है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच हालिया टकराव अब एक गंभीर संवैधानिक संकट का रूप लेता दिख रहा है। ED के कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचने के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी को गिरफ्तार किया जा सकता है और क्या राज्य में राष्ट्रपति शासन (Article 356) लागू करने की नौबत आ सकती है। यह पूरा मामला राज्य में संघीय तनाव को चरम पर ले गया है।
यह पूरा विवाद 8 जनवरी को हुई एक रेड से शुरू हुआ था, जब ED और इनकम टैक्स ने इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) के कोलकाता ऑफिस और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी की थी। यह कार्रवाई फर्जी सरकारी नौकरियों के घोटाले और अवैध कोयला खनन से जुड़े हवाला लेन-देन के संबंध में की गई थी। अधिकारियों के अनुसार, यह जांच नवंबर 2020 में दर्ज CBI की FIR पर आधारित है, जिसमें मुख्य आरोपी अनूप माझी और उसके सिंडिकेट पर ICL पट्टा क्षेत्रों से अवैध रूप से कोयला खनन करने का आरोप है।
छापे की खबर सुनते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंचीं और ED अधिकारियों के साथ ‘लोहा’ लिया। उन्होंने न केवल अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करवा दी, बल्कि यह भी दावा किया गया कि वह जब्त दस्तावेज और हार्ड डिस्क अपने साथ ले गईं। ममता बनर्जी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताते हुए आरोप लगाया कि I-PAC पर छापा मारकर उनकी चुनावी रणनीति जानने की कोशिश की गई है। वहीं, ED का कहना है कि यह मामला कोल-स्कीम, नौकरी घोटाला और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है, जिसका चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, ममता बनर्जी का हस्तक्षेप जांच में बाधा माना जा सकता है, जो IPC की धारा 186 के तहत अपराध है। अगर ED यह साबित कर देती है कि मुख्यमंत्री ने सबूत हटाए हैं, तो PMLA की धारा 67 के तहत उनकी गिरफ्तारी की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि, राज्य पुलिस ने ED अधिकारियों पर ही FIR दर्ज की है, जिसने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
मुख्यमंत्री के विरोध के बाद यह राजनीतिक मुद्दा केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव का विषय बन गया है। बंगाल बीजेपी के नेता शुभेंदु अधिकारी ने तुरंत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग उठाई और इस कार्रवाई को भ्रष्टाचार का खुला समर्थन बताया।
इसके तहत, राज्यपाल की रिपोर्ट पर केंद्र राष्ट्रपति शासन लगा सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई केस (1994) के फैसले ने इसे सीमित किया है। यह तभी लागू हो सकता है जब राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह टूट जाए।
यह प्रावधान करता है कि यदि कोई राज्य सरकार केंद्र के विशिष्ट निर्देश का पालन करने में विफल रहती है, तो राष्ट्रपति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है। केंद्र सरकार ममता बनर्जी के हस्तक्षेप को जांच में बाधा डालने का निर्देश मानते हुए 365 का इस्तेमाल कर सकती है, जो 356 लगाने का एक ठोस आधार बन सकता है।
इस बीच, टीएमसी सांसदों ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, जहां उन्हें हिरासत में ले लिया गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ED की कार्रवाई के खिलाफ हजारों समर्थकों के साथ 10 किलोमीटर का मेगा मार्च भी निकाला, जिसमें उन्होंने केंद्र पर ED के दुरुपयोग का आरोप लगाया।
फिलहाल, इस मामले पर राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने ED की मांग को ठुकराते हुए तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है और 14 जनवरी की तारीख बरकरार रखी है। हालांकि ममता बनर्जी के लिए कानूनी जोखिम बहुत ऊंचे हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से केंद्र सरकार को यह डर है कि राष्ट्रपति शासन लागू होने से टीएमसी को सहानुभूति वोट का फायदा मिल सकता है। सबकी निगाहें अब हाईकोर्ट के आगामी फैसले पर टिकी हैं।









