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वाराणसी: मुमुक्षु भवन में बुजुर्गों के लिए लगा विशेष जांच शिविर, ‘राष्ट्रीय वयोश्री योजना’ के तहत मिलेंगे सहायक उपकरण

सीआरसी वाराणसी द्वारा आयोजित शिविर

बुजुर्गों को सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन प्रदान करने की दिशा में केंद्र सरकार की ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में, वाराणसी में दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के अंतर्गत कार्यरत समेकित क्षेत्रीय केंद्र (सीआरसी) ने प्रधानमंत्री दिव्याशा केंद्र (पीएमडीके) के सहयोग से एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हाल ही में काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर स्थित मुमुक्षु भवन, वृद्धाश्रम में वृद्धजनों की जांच, परामर्श और कार्यात्मक आकलन के लिए एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया।

यह शिविर सीआरसी, वाराणसी के निदेशक आशीष कुमार झा के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ। शिविर का मुख्य लक्ष्य वृद्धजनों को आवश्यक पुनर्वास सेवाओं से जोड़ना था। इस पहल के तहत, विशेषज्ञों की टीम ने विस्तृत जांच और परामर्श प्रदान किया।

शिविर के दौरान मौजूद विशेषज्ञों में सहायक प्राध्यापक (विशेष शिक्षा) नमो नारायण पाठक, लेक्चरर (फिजियोथेरेपी) आशीष पाराशर, और अवनीश सिंह (पी एंड ओ) सहित अन्य सीआरसी एवं पीएमडीके विशेषज्ञ शामिल रहे। इन विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सेवाएं प्रदान कीं:

1. फिजियोथेरेपी जांच:- वृद्धजनों की शारीरिक गतिशीलता और दर्द संबंधी समस्याओं का आकलन किया गया।

2. कार्यात्मक आकलन:- यह जांच की गई कि बुजुर्ग अपनी दैनिक गतिविधियों (ADL) को कितनी आसानी से कर पा रहे हैं।

3. आवश्यक परामर्श:- स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर व्यक्तिगत मार्गदर्शन दिया गया।

इस शिविर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत सरकार की महत्वकांक्षी राष्ट्रीय वयोश्री योजना के अंतर्गत पात्र वृद्धजनों की पहचान करना था। उनकी पात्रता के आधार पर, उन्हें सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जाने हेतु चिन्हांकन किया गया।

सीआरसी, वाराणसी के निदेशक आशीष कुमार झा ने शिविर के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, “इस शिविर का मुख्य उद्देश्य वृद्धजनों को आवश्यक पुनर्वास सेवाओं से जोड़ना, उनकी कार्यात्मक क्षमता में सुधार करना तथा सहायक उपकरणों के माध्यम से उन्हें स्वावलंबी एवं सम्मानजनक जीवन प्रदान करना रहा।”

वाराणसी में आयोजित यह शिविर यह सुनिश्चित करता है कि वृद्धजनों को न केवल आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ मिलें, बल्कि वे सहायक उपकरणों के माध्यम से आत्मनिर्भर और सम्मानित जीवन जी सकें।

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