क्या चुनाव से पहले सरकारी खजाने से पैसा बांटना वोट खरीदने जैसा है? इसी बड़े और गंभीर सवाल को लेकर बिहार विधानसभा चुनाव का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने बिहार चुनाव की निष्पक्षता को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की है।
जन सुराज पार्टी का आरोप है कि पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, जब आचार संहिता लागू थी, लाखों महिलाओं के बैंक खातों में सीधे 10,000 रुपये ट्रांसफर किए गए थे। पार्टी ने यह दावा किया है कि यह पैसा मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत नए लाभार्थियों को जोड़कर दिया गया था, जिसका एकमात्र उद्देश्य मतदाताओं को प्रभावित करना था। जन सुराज पार्टी का कहना है कि आचार संहिता लागू होने के दौरान सरकारी योजनाओं के तहत पैसा बांटना संविधान के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है और यह चुनाव की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
याचिका में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। पार्टी ने कहा है कि चुनाव के दौरान ‘जीविका’ समूह से जुड़ी करीब 1.8 लाख महिलाओं को पोलिंग बूथ पर तैनात किया गया था। जन सुराज पार्टी का मानना है कि यह कदम भी नियमों के खिलाफ था और इससे मतदान की प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की बेंच करेगी। पार्टी ने Election Commission of India से भी इस पूरे प्रकरण की गंभीर जांच की मांग की है।
इन सभी कथित गड़बड़ियों के कारण जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से सख्त कार्रवाई की मांग की है और दोषियों को जिम्मेदार ठहराने की अपील की है। उनका सबसे बड़ा अनुरोध है कि राज्य में विधानसभा चुनाव दोबारा कराए जाएं, ताकि जनता बिना किसी प्रलोभन या दबाव के अपने सही प्रतिनिधि का चुनाव कर सके।
यह मामला सिर्फ बिहार के चुनावों तक सीमित नहीं है। जन सुराज पार्टी ने कोर्ट से यह भी कहा है कि मुफ्त योजनाओं और सीधे पैसे ट्रांसफर करने पर देशभर में स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाएं ताकि भविष्य में चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे। अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह फैसला न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश की चुनावी राजनीति के लिए एक नया और महत्वपूर्ण मानक स्थापित कर सकता है।









