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महाशिवरात्रि पर ब्रजभूमि से काशी विश्वनाथ के लिए ऐतिहासिक प्रसाद यात्रा, गूंजा ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय श्रीकृष्ण’

ब्रजभूमि से सनातन एकता और भक्ति का एक अद्भुत दृश्य

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर ब्रजभूमि (मथुरा) और काशी विश्वनाथ धाम (वाराणसी) के बीच सनातन आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि से बाबा विश्वनाथ के लिए एक विशेष प्रसाद यात्रा विधिवत रूप से प्रेषित की गई, जिसने शिव और कृष्ण की संयुक्त भक्ति यानी ‘हरिहर भाव’ को साकार किया। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन चेतना की एकता का प्रतीक बन गई।

लाखों ब्रजवासियों ने कृष्ण भक्ति के भाव को हृदय में संजोए हुए इस ऐतिहासिक यात्रा में सहभागिता की। महाशिवरात्रि, जिसे भगवान शिव और माता गौरी के विवाह तथा शिवलिंग के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है, उस दिन मथुरा से यह प्रसाद भेजना सनातन एकता का अनुपम उदाहरण बन गया। यह प्रसाद महाशिवरात्रि के दिन काशी में भगवान शिव को अर्पित किया जाएगा।

यात्रा का दिव्य दृश्य और विशेष सामग्री

इस प्रसाद यात्रा के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु मार्ग में उमड़े। श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर यात्रा का स्वागत किया और स्वयं को इस पुण्य अवसर का साक्षी बनाया। चारों ओर “हर-हर महादेव” और “जय श्रीकृष्ण” के उद्घोष गूंजते रहे, जिससे पूरे वातावरण में भक्ति का संचार हुआ।

यात्रा के साथ फलाहारी लड्डू, मेवा, फल, माता गौरी के श्रृंगार और भगवती के आभूषणों सहित विशेष सामग्री काशी के लिए भेजी गई है।

ब्रजवासियों का विश्वास है कि शिव, राम और कृष्ण — यही भारत की आत्मा हैं, और जब इनकी ऊर्जा त्रिवेणी के रूप में मिलती है, तो सनातन धर्म अपने पुरातन गौरव की ओर सशक्त कदम बढ़ाता है।

यह नवाचार और दिव्य समन्वय निश्चित रूप से सनातन धर्म के पुनर्गौरव का स्वर्णिम अध्याय लिखेगा। ब्रज के भक्तों ने यह आस्था व्यक्त की कि इसी एकता और विश्वास के बल पर सभी अधूरे तीर्थ पूर्ण होंगे, और श्रीकृष्ण जन्मभूमि का निर्माण भी अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त करेगा।

मथुरा से काशी तक आस्था की यह डोर खींचकर, ब्रजवासियों ने यह सिद्ध कर दिया कि हरि (कृष्ण) और हर (शिव) की भक्ति का समन्वय ही सनातन धर्म की वास्तविक शक्ति है, जो देश को एकता के सूत्र में बांधता है।