सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद भरण-पोषण (maintenance) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि पति अपनी पूर्व पत्नी को सपोर्ट देने की जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए नहीं बच सकता कि वह पढ़ी-लिखी है या उसे माता-पिता का वित्तीय सहयोग मिल रहा है। यह फैसला महिलाओं को वित्तीय सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट की हैं:
पीठ ने जोर देकर कहा कि विवाह केवल एक आर्थिक समझौता नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक जुड़ाव, साथ और पारस्परिक सहयोग की संस्था है। कोर्ट ने कहा कि एक महिला सम्मानजनक और स्थिर जीवन की उम्मीद के साथ विवाह में प्रवेश करती है। विवाह टूटने के बाद पति की यह जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती कि पत्नी शिक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि तलाक के बाद भी पत्नी उस जीवन स्तर के अनुरूप जीवन जीने की हकदार है, जैसा वह विवाह के दौरान जीती रही थी। पत्नी का यह अधिकार है कि उसे वही जीवन शैली (Standard of Living) और जीवन स्तर मिलना चाहिए जो उसे पति के साथ वैवाहिक जीवन में मिला था।
यह फैसला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर आया। फैमिली कोर्ट ने महिला को 15,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि पति की मासिक आय लगभग 1.60 लाख रुपये है, ऐसे में 15,000 रुपये पर्याप्त नहीं है। इस पर संज्ञान लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने महिला को मिलने वाली भरण-पोषण की राशि को दोगुना करते हुए 30,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट मत है कि पत्नी अपनी शादीशुदा जिंदगी में ससुराल में जिस स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग वाली जीवन शैली की आदी रही है, तलाक के बाद भी उसे वही मानक कायम रखने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला देश भर में तलाक और भरण-पोषण से जुड़े मामलों के लिए एक नजीर बनेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि विवाह टूटने के बाद भी महिला आर्थिक असुरक्षा का सामना न करे और सम्मानजनक जीवन जी सके।









