हिंदू धर्म में फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पावन तिथि को आमलकी एकादशी और रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु, शिव और देवी पार्वती के आशीर्वाद प्राप्त करने का अद्वितीय अवसर प्रदान करता है, साथ ही होली के पर्व से भी गहराई से जुड़ा है। आइए जानते हैं इस विशेष दिन का महत्व और इससे जुड़ी परंपराएं।
आमलकी एकादशी, जिसे आमलका एकादशी भी कहते हैं, भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इसमें सभी देवी-देवताओं का वास होता है। आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने और कथा सुनने से पापों का नाश होता है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह एकादशी भक्तों को उत्तम स्वास्थ्य, धन-धान्य और सौभाग्य प्रदान करती है, और इसका व्रत सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना जाता है।
वहीं, रंगभरी एकादशी का संबंध भगवान शिव और देवी पार्वती से है, विशेषकर वाराणसी में इसका उल्लास देखते ही बनता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव, देवी पार्वती को विवाह के बाद पहली बार अपनी नगरी काशी लेकर आए थे। इसी खुशी में भक्तगण गुलाल उड़ाकर और रंग खेलकर उत्सव मनाते हैं, जो फाल्गुन मास में आने वाली होली के आगमन का संकेत भी देता है। रंगभरी एकादशी के दिन काशी विश्वनाथ मंदिर से शिव-पार्वती की विशेष डोली यात्रा निकाली जाती है, जिसमें भक्तगण भक्ति और उत्साह के साथ शामिल होकर रंगों का पर्व मनाते हैं।
आमलकी और रंगभरी एकादशी हमें आध्यात्मिकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और उत्सव की भावना से जोड़ती है। यह हमें यह स्मरण कराती है कि धार्मिक पर्व केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध का भी प्रतीक हैं, जो जीवन में आनंद और सकारात्मकता भरते हैं।









